पेम्ब्रोलिजुमैब, डुरवालुमैब और ओसिमर्टिनिब समेत कई दवाएं सूची में शामिल
2019 में 42 दवाओं पर लागू हुई थी व्यवस्था, 526 ब्रांडों के दाम 90% तक घटे थे
आगरा। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 137 दवाओं की कीमतें घटने का रास्ता साफ हो गया है। केंद्र सरकार ने इन दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा 30 प्रतिशत तय की है। संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होंगी।
सरकार का अनुमान है कि दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) में मौजूदा कीमतों के मुकाबले 20 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है और मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।https://todaynewstrack.com/2026/10/cancer-medicines-price-reduction-india-2026/
यह फैसला उन कैंसर दवाओं पर लागू होगा जो अभी निर्धारित अधिकतम कीमत वाली अनुसूचित श्रेणी में नहीं आतीं। सूची में पहले से इस्तेमाल हो रही दवाओं के साथ पेटेंट वाली दवाएं भी शामिल हैं। सरकार ने यह कदम दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच बड़े अंतर को कम करने के लिए उठाया है।
कौन-कौन सी कैंसर दवाएं सूची में शामिल हैं?
केंद्र की अधिसूचना में 137 दवाओं के नाम दिए गए हैं। इनमें पेम्ब्रोलिजुमैब, डुरवालुमैब और ओसिमर्टिनिब जैसी दवाएं शामिल हैं। सूची में स्तन कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली डेनोसुमैब भी है।
कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली अन्य दवाओं में बेवेसिजुमैब, पेगफिलग्रास्टिम, रिबोसिक्लिब और एबेमासिक्लिब भी शामिल हैं। बेवेसिजुमैब का इस्तेमाल कोलन, ओवरी और सर्वाइकल कैंसर के उपचार में किया जाता है। पेगफिलग्रास्टिम कैंसर के मरीजों में न्यूट्रोपीनिया का खतरा कम करने के लिए दी जाती है।
इस सूची में इम्यूनोथेरेपी की दवाएं भी हैं, जिनका इस्तेमाल 20 से अधिक प्रकार के कैंसर के उपचार में किया जाता है। सूची विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के आधार पर तैयार की गई है और जरूरत के अनुसार इसमें आगे बदलाव किया जा सकता है।

क्या ये दवाएं बाजार में नई आई हैं?
नहीं। 137 दवाओं की सूची का मतलब यह नहीं है कि ये सभी दवाएं पहली बार बाजार में आई हैं। इनमें कई दवाएं पहले से कैंसर के इलाज में इस्तेमाल हो रही हैं। अब इनके मूल्य निर्धारण में व्यापारिक मार्जिन की सीमा लागू की जा रही है।
इससे पहले वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने 42 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर इसी तरह का प्रयोग किया था। उस व्यवस्था के बाद 526 ब्रांडों की अधिकतम खुदरा कीमतों में 90 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई थी। अब सरकार ने इस व्यवस्था का दायरा बढ़ाकर 137 दवाओं को इसमें शामिल किया है।
कितने रुपये घटेंगे, कितना सस्ता होगा इलाज?
सरकार के आकलन के मुताबिक, नई व्यवस्था से संबंधित दवाओं की एमआरपी में लगभग 20 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। हालांकि, हर दवा में एक जैसी कटौती नहीं होगी। कीमत में वास्तविक बदलाव संबंधित दवा की मौजूदा कीमत, निर्माता की बिक्री कीमत और उसके व्यापारिक मार्जिन पर निर्भर करेगा।
अभी सभी दवाओं की पुरानी और नई एमआरपी का अलग-अलग अंतिम ब्योरा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। निर्माताओं को अधिसूचना जारी होने के सात दिन के भीतर संशोधित कीमतों की जानकारी राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) को देनी है। इसलिए किसी खास दवा के दाम में कितने रुपये की कमी होगी, इसकी पुष्टि संशोधित मूल्य सूची जारी होने के बाद ही की जा सकेगी।
सरकार का अनुमान है कि इस कदम से मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। यह अनुमान है, प्रत्येक मरीज को मिलने वाली तय बचत नहीं। मरीज को वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके इलाज में कौन-सी दवा इस्तेमाल होती है और उसकी कीमत कितनी घटती है।
30 प्रतिशत मार्जिन का क्या मतलब है?
सरकार ने निर्माता से स्टॉकिस्ट या वितरक को दवा बेचने की कीमत के आधार पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय की है। अधिसूचना के अनुसार, एमआरपी की गणना में व्यापारिक मार्जिन 30 प्रतिशत से अधिक नहीं रखा जा सकेगा। इसके बाद लागू जीएसटी जोड़ा जाएगा।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी दवा की स्टॉकिस्ट या वितरक को बिक्री कीमत 70 रुपये है, तो 30 प्रतिशत व्यापारिक मार्जिन के हिसाब से जीएसटी से पहले उसकी अधिकतम खुदरा कीमत 100 रुपये होगी। यदि उसी दवा की मौजूदा एमआरपी 300 रुपये है, तो नए नियम के तहत गणना से निकली अधिकतम कीमत 100 रुपये और लागू जीएसटी होगी।http://137-cancer-medicines-new-prices-from-november-9-2026
हालांकि, यदि किसी दवा की मौजूदा एमआरपी नई गणना से निकली कीमत से कम है, तो कंपनी को पुरानी कम कीमत ही बनाए रखनी होगी। यानी नियम का उद्देश्य कीमत घटाना है, पहले से कम कीमत पर बिक रही दवा का दाम बढ़ाना नहीं।
9 नवंबर से अस्पतालों और दुकानों पर लागू होंगे नए दाम
निर्माताओं को संशोधित एमआरपी की सूची एनपीपीए और संबंधित राज्य औषधि नियंत्रक को भेजनी होगी। दवा कंपनियों को नई कीमतें अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करने और अस्पतालों, वितरकों तथा खुदरा विक्रेताओं तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।
9 नवंबर से संबंधित दवाएं संशोधित कीमत पर ही बेची जानी हैं। अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को भी नई कीमतों की निगरानी करनी होगी और अपनी वेबसाइट पर संशोधित मूल्य सूची प्रदर्शित करनी होगी। नियमों का उल्लंघन होने पर अधिक वसूली गई रकम ब्याज सहित जमा कराने की कार्रवाई हो सकती है।
सरकार ने दवा कंपनियों को इन दवाओं का मौजूदा उत्पादन और आपूर्ति बनाए रखने को भी कहा है, ताकि कीमतें कम होने के कारण बाजार में दवाओं की कमी न हो।
पहले की व्यवस्था और नई पहल में अंतर
औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के तहत अनुसूचित दवाओं की अधिकतम कीमत तय की जाती है। गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में निर्माता सामान्यतः शुरुआती एमआरपी तय करते हैं। सरकार का कहना है कि कुछ कैंसर दवाओं की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली एमआरपी के बीच अंतर काफी अधिक पाया गया। इसी अंतर को कम करने के लिए नई व्यवस्था लागू की गई है।
एनपीपीए के आकलन में गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर औसत व्यापारिक बढ़ोतरी करीब 170 प्रतिशत तक पाई गई, जबकि कुछ मामलों में यह 700 प्रतिशत तक थी। नई व्यवस्था का उद्देश्य अत्यधिक मार्जिन कम करना है, ताकि महंगी दवाओं का खर्च मरीजों और उनके परिवारों पर कम पड़े।
सुप्रीम कोर्ट में दवाओं की कीमतों पर सुनवाई
दवाओं की कीमतों और व्यापारिक मार्जिन का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी उठा। सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता केसी जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की जनहित याचिकाओं पर 27 अक्टूबर को सुनवाई पूरी हुई और अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक कैंसर मरीज के उपचार में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन की कीमत में बड़े अंतर का उदाहरण दिया। अदालत के सामने रखे गए विवरण के अनुसार, वितरक को लगभग 11 हजार रुपये में उपलब्ध इंजेक्शन के लिए अस्पताल ने 1.30 लाख रुपये वसूले। पीठ ने लगभग 15 रुपये में खुदरा विक्रेता को मिलने वाली ड्रिप लाइन के लिए मरीज से 250 रुपये लिए जाने पर भी सवाल उठाया।
केंद्र सरकार ने दवाओं की कीमतों और उपलब्धता के बीच संतुलन बनाने के लिए उठाए गए कदमों का पक्ष रखा। निजी अस्पतालों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अस्पतालों के संचालन और चौबीसों घंटे सेवाएं उपलब्ध कराने की लागत का उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि अस्पताल चलाने की जरूरत दवाओं पर अत्यधिक मार्जिन का औचित्य नहीं बन सकती।
याचिकाओं में गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमतों के नियमन, चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य या मार्जिन सीमा और जेनेरिक नाम से दवाएं लिखने जैसे मुद्दे उठाए गए हैं। अब अदालत के फैसले से दवाओं की कीमतों के व्यापक नियमन पर आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।
