नई दिल्ली/आगरा। आगरा में राष्ट्रीय राजमार्ग-19 पर भारी वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं और लोगों की मौतों का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने अदालत के समक्ष मुद्दा उठाया कि करीब 400 करोड़ रुपये की लागत से उत्तरी बाईपास बनने के बावजूद ऐसे ट्रक और कंटेनर शहर के बीच से गुजर रहे हैं, जिन्हें आगरा में रुकना नहीं है।
अदालत ने केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को होगी। आवेदन में भारी वाहनों को शहर के बाहर से निकालने, टोल व्यवस्था में समन्वय और यातायात नियमों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है।https://todaynewstrack.com/2026/10/agra-heavy-vehicles-relief-supreme-court-agra-up-news/
शहर के बीच से गुजरने वाले भारी वाहनों के कारण सड़क दुर्घटनाओं में लोगों की जान जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। राष्ट्रीय राजमार्ग-19 पर लगातार हो रही दुर्घटनाओं और आम नागरिकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने अदालत का ध्यान आगरा की ओर आकर्षित किया।
उन्होंने कहा कि जब शहर के बाहर से भारी वाहनों को निकालने के लिए लगभग 400 करोड़ रुपये की लागत से उत्तरी बाईपास बनाया जा चुका है, तब भी ऐसे ट्रक और कंटेनर शहर के भीतर से गुजर रहे हैं, जिन्हें आगरा में रुकना ही नहीं है। इससे स्कूली बच्चों, मरीजों, पैदल यात्रियों, दोपहिया वाहन चालकों और अन्य नागरिकों की जान पर खतरा बना हुआ है।
के.सी. जैन की ओर से इस संबंध में दाखिल अंतरिम आवेदन संख्या 18487/2026 उस दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने सड़क सुरक्षा से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई के दौरान यह मुद्दा अदालत के सामने उठाया। मामले की गंभीरता पर ध्यान देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। इनमें केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) शामिल हैं। अदालत ने आवेदन पर अगली सुनवाई के लिए 25 नवंबर 2026 की तारीख निर्धारित की है।
घनी आबादी के बीच से गुजर रहा राष्ट्रीय राजमार्ग
आवेदन में बताया गया है कि राष्ट्रीय राजमार्ग-19 आगरा की घनी आबादी के बीच से गुजरता है। राजमार्ग के दोनों ओर आवासीय कॉलोनियां, स्कूल, अस्पताल, बाजार और ऐतिहासिक स्मारक स्थित हैं। सिकंदरा, खंदारी, भगवान टॉकीज, रामबाग और ट्रांस यमुना जैसे क्षेत्रों में स्थानीय यातायात के साथ भारी वाहनों की आवाजाही भी होती है। इन रास्तों पर ट्रक और कंटेनर गुजरने से दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है।
शहर के भीतर स्थानीय लोगों को रोजमर्रा के काम से निकलना पड़ता है। स्कूली बच्चों को स्कूल पहुंचना होता है, मरीज अस्पताल जाते हैं और बाजारों में लोगों की आवाजाही बनी रहती है। ऐसे में तेज रफ्तार भारी वाहनों का आवागमन आम नागरिकों के लिए जोखिम पैदा करता है। आवेदन में इसी स्थिति को गंभीर सड़क सुरक्षा समस्या बताते हुए ऐसे वाहनों के लिए वैकल्पिक मार्ग का इस्तेमाल अनिवार्य करने की मांग की गई है, जिनका आगरा में कोई गंतव्य नहीं है।
जनवरी में हुए हादसों का भी किया उल्लेख
अंतरिम आवेदन में आगरा में हुई कई जानलेवा दुर्घटनाओं का उल्लेख किया गया है। इनमें 8 जनवरी 2026 को विजय नगर कॉलोनी के पास एक ट्रक के सड़क किनारे बनी झोपड़ी पर पलटने से तीन लोगों की मौत की घटना शामिल है। इसके अलावा 15 जनवरी को सिकंदरा के पास ट्रक की टक्कर से दो लोगों की मौत का भी उल्लेख किया गया है। आवेदन में सिकंदरा, खंदारी और अन्य स्थानों पर हुई दुर्घटनाओं में लोगों की जान जाने की घटनाओं को भी सामने रखा गया है।
इन घटनाओं के माध्यम से यह सवाल उठाया गया है कि जब शहर के बाहर से भारी वाहनों को निकालने के लिए वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध है, तब उन्हें घनी आबादी वाले क्षेत्रों से गुजरने की जरूरत क्यों पड़ रही है। आवेदन में मांग की गई है कि दुर्घटनाओं के बाद कार्रवाई करने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका को पहले ही कम किया जा सके।
400 करोड़ से बना बाईपास, फिर भी शहर के भीतर भारी वाहन
आवेदन के अनुसार, लगभग 400 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित 14 किलोमीटर लंबा आगरा उत्तरी बाईपास 4 दिसंबर 2025 से चालू है। यह बाईपास यमुना एक्सप्रेसवे से जुड़कर आगरा शहर के बाहर से गुजरने के लिए वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराता है। आवेदन में बताया गया है कि शहर के भीतर से गुजरने वाला संबंधित मार्ग लगभग 34 किलोमीटर लंबा है, जबकि बाईपास और यमुना एक्सप्रेसवे के रास्ते की दूरी लगभग 38 किलोमीटर है।
इस तरह शहर के बाहर से गुजरने पर भारी वाहनों को लगभग चार किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी होगी। आवेदन में सवाल उठाया गया है कि इतनी कम अतिरिक्त दूरी के बावजूद भारी वाहन शहर के भीतर से क्यों गुजर रहे हैं, जबकि इससे स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
के.सी. जैन की ओर से अदालत में उठाए गए मुद्दे का प्रमुख आधार यही है कि बाईपास का उद्देश्य शहर के भीतर अनावश्यक भारी यातायात को कम करना और लोगों को सुरक्षित आवागमन उपलब्ध कराना है। यदि जिन वाहनों का आगरा में कोई काम या गंतव्य नहीं है, उन्हें शहर के बीच से गुजरने दिया जाता है, तो बाईपास बनाने का अपेक्षित लाभ पूरी तरह नहीं मिल पाएगा।
टोल बचाने के लिए शहर से गुजरने का आरोप
आवेदन में यह भी कहा गया है कि उत्तरी बाईपास और यमुना एक्सप्रेसवे के रास्ते पर अलग-अलग टोल वसूले जाने के कारण कुछ भारी वाहन अतिरिक्त टोल खर्च से बचने के लिए शहर के भीतर से गुजरना पसंद करते हैं। इसके चलते वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध होने के बावजूद उसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है।
इस समस्या के समाधान के लिए आवेदन में टोल व्यवस्था को तर्कसंगत बनाने और संबंधित प्राधिकरणों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की मांग की गई है। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि शहर के भीतर से गुजरने की तुलना में बाईपास का इस्तेमाल भारी वाहनों के लिए व्यावहारिक विकल्प बने और अनावश्यक रूप से घनी आबादी वाले क्षेत्रों में उनका प्रवेश कम हो।
भारी वाहनों को बाईपास से निकालने की मांग
के.सी. जैन ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि जिन भारी व्यावसायिक वाहनों का आगरा में कोई गंतव्य नहीं है, उनके लिए राष्ट्रीय राजमार्ग-19 के शहर के भीतर वाले हिस्से से गुजरने के बजाय उत्तरी बाईपास और यमुना एक्सप्रेसवे का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाए। इसके लिए आवश्यक सरकारी अधिसूचना जारी करने की मांग भी की गई है।
आवेदन में प्रमुख स्थानों पर स्पष्ट यातायात संकेतक लगाने और नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई है। इसके साथ ही टोल व्यवस्था और संबंधित प्राधिकरणों के बीच समन्वय की जरूरत पर भी जोर दिया गया है, ताकि भारी वाहनों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने में अनावश्यक परेशानी न हो।
आवेदन में यह मांग केवल आगरा तक सीमित नहीं रखी गई है। इसमें कहा गया है कि देश के दूसरे शहरों में भी जहां बाईपास बन चुके हैं, वहां ऐसे भारी वाहनों को बाईपास से निकाला जाए, जिनका संबंधित शहर में कोई गंतव्य नहीं है। इससे शहरों के भीतर यातायात का दबाव घटाने के साथ सड़क दुर्घटनाओं, जाम, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है।
सड़क बनने का उद्देश्य लोगों की जान बचाना
सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन ने कहा कि जब सरकार जनता के लगभग 400 करोड़ रुपये खर्च करके बाईपास बना चुकी है, तो भारी वाहनों को शहर के बीच से गुजरने की अनुमति क्यों दी जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केवल चार किलोमीटर की दूरी या कुछ टोल बचाने के लिए लोगों की जान जोखिम में डाली जा सकती है।
उन्होंने कहा कि सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाला व्यक्ति केवल एक आंकड़ा नहीं होता, बल्कि किसी परिवार का पिता, मां, बेटा या बेटी होता है। किसी व्यक्ति की मौत से पूरा परिवार प्रभावित होता है। उनके अनुसार, सड़क सुरक्षा का वास्तविक उद्देश्य दुर्घटना होने के बाद मुआवजा देना भर नहीं, बल्कि दुर्घटना होने से पहले उसे रोकने के उपाय करना है।
जैन ने स्पष्ट किया कि उनकी मांग वाहनों के आवागमन या व्यापार को रोकने की नहीं है। उनका कहना है कि जिन भारी वाहनों का आगरा से कोई संबंध नहीं है, उन्हें शहर के बाहर बने बाईपास का इस्तेमाल करना चाहिए। बाईपास बनाने का उद्देश्य केवल सड़क तैयार करना नहीं, बल्कि शहर के लोगों की जान बचाना और यातायात को सुरक्षित बनाना भी है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए जाने के बाद इस समस्या का प्रभावी समाधान निकालने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। अब मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को होगी।
