अधिवक्ता केसी जैन की जनहित याचिका पर सुनवाई
स्टेंट और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में बड़े अंतर पर भी उठे सवाल
आगरा। कैंसर की दवाओं के दाम घटाने का फैसला क्या दूसरी दवाओं और चिकित्सा उपकरणों पर भी लागू होगा? सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं की कीमतों और व्यापारिक मार्जिन में बड़े अंतर पर सवाल करते हुए पूछा कि राहत केवल कैंसर की दवाओं तक ही क्यों सीमित रखी जा रही है।
आगरा के अधिवक्ता केसी जैन की जनहित याचिका के साथ आगरा के डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की याचिका भी अदालत में विचाराधीन है। याचिकाओं में मरीजों को सस्ती दवाएं और किफायती उपचार उपलब्ध कराने का मुद्दा उठाया गया है।
केसी जैन के अनुसार, सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कहा, “देश की जनता के लिए इस मामले से अधिक महत्वपूर्ण कोई मामला नहीं हो सकता।” दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों का यह मामला सीधे मरीजों की जेब और इलाज पर होने वाले खर्च से जुड़ा है।https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2321092&lang=1®=48
कैंसर की दवाओं के मार्जिन पर 30 प्रतिशत की सीमा
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि केंद्र सरकार ने कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का निर्णय लिया है। इसके दायरे में आने वाली दवाओं की सूची जारी की जाएगी और जरूरत के अनुसार उसमें नई दवाएं शामिल की जा सकेंगी। हालांकि, अदालत ने पूछा कि जब दूसरी दवाओं और चिकित्सा उपकरणों में भी अधिक मार्जिन की समस्या सामने आ रही है, तो नियंत्रण का दायरा व्यापक क्यों नहीं किया जा रहा।https://www.sci.gov.in/case-status-court/
पांच हजार के स्टेंट की एमआरपी 25 हजार रुपये क्यों?
सुनवाई में एक भारतीय निर्मित हृदय स्टेंट का उदाहरण सामने आया। न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने खुदरा विक्रेता को 5,000 रुपये में मिलने वाले स्टेंट की एमआरपी 25,000 रुपये होने पर सवाल उठाया। पीठ ने सलाइन की ड्रिप लाइन का उदाहरण देते हुए 11 रुपये और 270 रुपये की कीमतों के अंतर का भी उल्लेख किया। अदालत ने जानना चाहा कि आपूर्ति मूल्य की तुलना में कई गुना अधिक एमआरपी तय करने का आधार क्या है।https://www.jagran.com/
दवाओं के दाम 20 से 70 प्रतिशत तक घटने का अनुमान
औषध विभाग के हलफनामे के मुताबिक, यह निर्णय राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की 8 अक्टूबर की बैठक में लिया गया। सरकार का अनुमान है कि प्रस्तावित व्यवस्था से संबंधित कैंसर दवाओं की एमआरपी में 20 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। इससे मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद है। दवाओं की सूची तय करने के लिए स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित की गई है, जिसे 10 से 15 दिनों में सिफारिशें देनी हैं। वास्तविक राहत सूची और व्यवस्था लागू होने के बाद स्पष्ट होगी।
अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर भी सवाल
केंद्र के हलफनामे में कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन 170 से 700 प्रतिशत या उससे अधिक और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली उपभोग्य चिकित्सा सामग्री पर 100 से 1,000 प्रतिशत या उससे अधिक होने की बात स्वीकार की गई है। हलफनामे में यह भी उल्लेख है कि अस्पताल अधिक मार्जिन देने वाले निर्माताओं की दवाएं खरीदकर मरीजों को एमआरपी पर बेच सकते हैं।https://www.amarujala.com/india-news/supreme-court-question-cancer-medicine-mrp-suggest-cap-on-retail-price-2026-09-29
सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि कीमतों पर नियंत्रण तय करते समय उपलब्धता और बाजार की परिस्थितियों के बीच संतुलन जरूरी है। अत्यधिक नियंत्रण से दवाओं की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई। इस पर पीठ ने पूछा कि मौजूदा औषध मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) के तहत 16 प्रतिशत खुदरा मार्जिन के आधार पर मूल्य नियंत्रित होने वाली दवाएं क्या उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचतीं।http://टुडे न्यूजट्रैक
मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को होगी। अब निगाह इस बात पर है कि दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में अंतर कम करने के लिए नियंत्रण का दायरा कितना बढ़ता है और मरीजों को इसका कितना लाभ मिलता है।

