चरणों में गिरकर भरत ने मांगी राम की वापसी, प्रभु ने सौंपीं चरण पादुकाएं
जयंत प्रसंग का भी हुआ भावपूर्ण मंचन
आगरा। भ्राता के वियोग में भरत के छलकते आंसू, प्रभु श्रीराम को अयोध्या वापस ले जाने की व्याकुलता और दूसरी ओर पिता के वचन को निभाने का अटूट संकल्प। चित्रकूट में भरत मिलाप का यह भावुक प्रसंग रविवार को श्री रामलीला कमेटी की ओर से रामलीला मैदान में आयोजित श्री रामलीला महोत्सव 2026 में साकार हुआ।
भरत के निश्छल प्रेम, त्याग और समर्पण ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। भरत के बार-बार आग्रह के बावजूद प्रभु श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने की प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। अंत में उन्होंने अपनी चरण पादुकाएं भरत को सौंप दीं। भरत इन्हें सिर पर धारण कर अयोध्या लौटे और श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में राज्य संचालन का संकल्प लिया।

पिता के निधन की खबर सुन व्याकुल हुए भरत
प्रभु श्रीराम, भ्राता लक्ष्मण और मां जानकी के चित्रकूट पहुंचने के बाद सुमंत अयोध्या लौटकर महाराज दशरथ को वनवास का समाचार सुनाते हैं। पुत्र वियोग में व्याकुल महाराज दशरथ कुछ समय बाद प्राण त्याग देते हैं। उधर, ननिहाल में रह रहे भरत को पिता के निधन का समाचार मिलता है।
अयोध्या लौटने पर जब भरत को माता कैकेयी के वरदानों के कारण श्रीराम के वनवास और महाराज दशरथ के निधन की जानकारी मिलती है, तो वह दुखी और क्रोधित हो उठते हैं। वह माता कैकेयी को धिक्कारते हुए राजपाट का त्याग कर प्रभु श्रीराम को वापस लाने के लिए चित्रकूट पहुंचते हैं।

भरत की विनती के आगे भी नहीं डिगी श्रीराम की प्रतिज्ञा
चित्रकूट में चारों भाइयों का मिलन रामलीला का सबसे भावुक प्रसंग बना। भरत प्रभु श्रीराम के चरणों में गिरकर उनसे अयोध्या लौटने की बार-बार प्रार्थना करते हैं। वह कहते हैं कि अयोध्या का सिंहासन उन्हीं का है। उनके बिना राजमहल, नगर और प्रजा सभी सूने हैं। भरत की विनम्रता और समर्पण देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठते हैं।
भरत के आग्रह के बावजूद प्रभु श्रीराम पिता के वचन और रघुकुल की मर्यादा का पालन करते हुए चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने के संकल्प से विचलित नहीं होते। इसी दौरान महाराज जनक भी चित्रकूट पहुंचकर श्रीराम से भेंट करते हैं और उन्हें अयोध्या लौटने के लिए समझाते हैं, लेकिन श्रीराम अपने धर्म और कर्तव्य पर अडिग रहते हैं।
चरण पादुकाएं सिर पर रख भरत लौटे अयोध्या
अंत में प्रभु श्रीराम अपनी चरण पादुकाएं भरत को सौंपते हैं और उन्हें अयोध्या का राज्यकार्य संभालने की आज्ञा देते हैं। भरत चरण पादुकाओं को सिर पर धारण कर अयोध्या लौटने का संकल्प लेते हैं। वह स्वयं राजा के रूप में नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में राज्य की सेवा करने का प्रण करते हैं।
भरत मिलाप का यह प्रसंग त्याग, निष्ठा और आदर्श भ्रातृ प्रेम की मिसाल बना। लीला के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि सत्ता से बढ़कर सेवा और अधिकार से बढ़कर कर्तव्य का महत्व है।http://Bharat Milap at Shri Ramleela Mahotsav
मां जानकी को कष्ट पहुंचाने पर श्रीराम ने दिया जयंत को दंड
भरत मिलाप के बाद जयंत प्रसंग का मंचन किया गया। देवराज इंद्र के पुत्र जयंत कौए का रूप धारण कर मां जानकी के पास पहुंचते हैं और उनके चरणों में चोंच मारकर उन्हें पीड़ा पहुंचाते हैं। मां जानकी को कष्ट में देखकर प्रभु श्रीराम क्रोधित हो उठते हैं और जयंत को दंड देने के लिए बाण छोड़ते हैं।
श्रीराम के बाण से बचने के लिए जयंत तीनों लोकों में भटकता है, लेकिन उसे कहीं शरण नहीं मिलती। अंततः वह प्रभु श्रीराम की शरण में लौटता है। श्रीराम उसे दंडस्वरूप एक नेत्र से वंचित कर देते हैं। इस प्रसंग में प्रभु की शक्ति, न्याय और शरणागत के प्रति करुणा का चित्रण किया गया।https://todaynewstrack.com/2026/09/shri-ramlila-mahotsav-2026-narad-muni-maya-hari-abhiman/
कमेटी के पदाधिकारियों ने उतारी स्वरूपों की आरती
इस अवसर पर रामलीला कमेटी के महामंत्री राजीव अग्रवाल, ताराचंद अग्रवाल, मुकेश जौहरी, राकेश जैन, रमांशु शर्मा, महेश चंद्र अग्रवाल, गिरधर शरण अग्रवाल, विकास अग्रवाल, शैलेश अग्रवाल, अनुज अग्रवाल, अजय गर्ग और राजीव गुप्ता आदि ने प्रभु श्रीराम, माता जानकी एवं अन्य स्वरूपों की आरती उतारी। श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के जयघोष के साथ प्रभु के दर्शन किए।https://todaynewstrack.com/2026/09/shri-ram-baraat-deshbhar-ki-sanskriti-8-km-safar-51-se-zyada-jhankiyan/
रामलीला में आज
कमेटी के मीडिया प्रभारी राहुल गौतम ने बताया कि सोमवार, 12 अक्टूबर को शूर्पणखा के नाक-कान काटने तथा खर-दूषण वध की लीला का मंचन किया जाएगा।

