आगरा। जेपी वेडिंग ग्राउंड, फतेहाबाद रोड पर करुणानिधान परिवार की ओर से चल रही मोरारी बापू की रामकथा के आठवें दिन साधुता, गुरु, भक्ति और पारिवारिक जिम्मेदारियों से जुड़े प्रसंगों के साथ कथा अयोध्या कांड से आगे बढ़ते हुए किष्किंधा और लंका तक पहुंची। बापू ने कहा कि साधुता किसी पद या बाहरी क्रिया का नाम नहीं, बल्कि ऐसा स्वभाव है जिसमें व्यक्ति सबल होने के बावजूद सरल और करुणामय बना रहे। उन्होंने रामकथा को किसी एक संप्रदाय तक सीमित न मानते हुए पूरे जग की कथा बताया। कथा में भरत का त्याग, हनुमानजी की सेवा, जामवंतजी द्वारा उनकी सामर्थ्य का स्मरण कराने, माता सीता से भेंट और रामेश्वरम स्थापना तक के प्रसंग सुनाए गए। अंतिम दिन की कथा बुधवार को सुबह नौ बजे से दोपहर करीब 12 बजे तक होगी।
कथा का आरंभ मानस ऋषि पंचमी के भाव को आगे बढ़ाते हुए ऋषियों, मुनियों और साधुओं को प्रणाम के साथ हुआ। बापू ने कहा कि हरिभजन करते रहने से प्रबल दोष और तीव्र पाप भी क्षीण होने लगते हैं। जब भजन के प्रभाव से मनुष्य के दोष स्वतः कम होने लगते हैं तो उसके भीतर ऋषि भाव विकसित होता है। उन्होंने मानस के हनुमानजी और भरतजी को साधुता के दो स्वरूपों के रूप में सामने रखा। हनुमानजी सेवा के आदर्श हैं, जबकि भरतजी त्याग और वैराग्य का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
बापू ने कहा कि सामर्थ्य होने के बाद भी सरल बने रहना और आंखों में करुणा का भाव रखना साधुता की पहचान है। उन्होंने संतों के प्रति श्रद्धा रखने तथा साधु, संत या देव परंपरा की निंदा से बचने की बात कही। उनके अनुसार भक्ति और संत प्रेम से व्यक्ति के आचरण में परिवर्तन आता है। संजीवनी पर्वत के प्रसंग में भरतजी द्वारा गुरु और आराध्य की शक्ति का स्मरण कराने की चर्चा करते हुए उन्होंने गुरु को जीवन को दिशा देने वाली शक्ति बताया।
पंचमियों के माध्यम से साधना का भाव
ऋषि पंचमी के प्रसंग से बापू ने भारतीय परंपरा में आने वाली विभिन्न पंचमियों का उल्लेख किया। लाभ पंचमी, विवाह पंचमी, वसंत पंचमी, रंग पंचमी, श्री पंचमी, नाग पंचमी और ललिता पंचमी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि तिथियां केवल तारीखें नहीं हैं। इनके माध्यम से साधना, स्मरण और संस्कार की परंपरा जुड़ी हुई है।
रामकथा के स्वरूप पर उन्होंने कहा कि यह किसी संप्रदाय विशेष की कथा नहीं, बल्कि पूरे जग की कथा है। उन्होंने रामचरितमानस के श्रवण को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सुनने से कथा के प्रति प्रीति उत्पन्न होती है। कथा के साथ अन्न वितरण और प्रसादी की परंपरा को भी उन्होंने आवश्यक बताया। इसी संदर्भ में गुरु नानक की पंगत-संगत और सिख परंपरा के लंगर का स्मरण करते हुए कहा, “भजन करो और भोजन करो।”
परिवार में जिम्मेदारी का समय पहचानें
अयोध्या कांड में प्रवेश गुरु वंदना के साथ हुआ। बापू ने युवावस्था में गुरु की शरण लेने की बात कही। अयोध्या, मिथिला, किष्किंधा और लंका की आध्यात्मिक प्रतीकात्मकता का उल्लेख करते हुए चित्रकूट को प्रेम की नगरी बताया।
दशरथजी के प्रसंग से उन्होंने परिवार में जिम्मेदारियों के हस्तांतरण की बात रखी। कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन के बदलते समय को पहचानना चाहिए। जब उम्र का संकेत मिलने लगे तो संतान को परिवार और कारोबार की जिम्मेदारी सौंपने का समय समझना चाहिए। जिम्मेदारी देने के बाद उसके जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। परिवार में पुत्रवधू की प्रशंसा करने और प्रेमपूर्ण वातावरण बनाए रखने की बात भी उन्होंने कही।
राम के वनवास और भरत के त्याग का प्रसंग
कथा में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों के बाद वनवास का प्रसंग आया। वचनबद्धता के कारण श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ वन की ओर चले। मार्ग में ऋषि-मुनियों के आश्रमों का वर्णन हुआ। इसके बाद अत्रि-अनसूया आश्रम और पंचवटी में निवास की कथा सुनाई गई।
सुमंत के अयोध्या लौटने और दशरथजी की व्याकुलता के बाद भरत चित्रकूट पहुंचे। उन्होंने श्रीराम से वापस अयोध्या चलने का आग्रह किया, लेकिन पिता के वचन को सर्वोपरि मानते हुए राम ने लौटने से इनकार किया। भरत ने उनकी खड़ाऊं स्वीकार की और नंदीग्राम में रहकर राज्य का संचालन किया। बापू ने भरत के त्याग को सहज बताया और कहा कि उन्होंने कभी अपने वैराग्य का प्रदर्शन नहीं किया।
पंचवटी से किष्किंधा तक पहुंची कथा
आगे चित्रकूट और पंचवटी के प्रवास, ऋषियों से भेंट तथा शूर्पणखा प्रसंग का वर्णन हुआ। बापू ने मानस में प्रयुक्त ‘बड़भागी’ शब्द की चर्चा करते हुए गुरु के चरणों में अनुराग रखने वाले व्यक्ति को भी बड़भागी बताया। जटायु के प्रति श्रीराम के भाव का भी उन्होंने उल्लेख किया।
किष्किंधा कांड में बाली और सुग्रीव के प्रसंग के साथ श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता की कथा आई। सीता की खोज के लिए वानर दल को चारों दिशाओं में भेजा गया। दक्षिण दिशा में जामवंतजी के साथ हनुमानजी गए। समुद्र के सामने पहुंचने पर हनुमानजी अपनी सामर्थ्य भूल गए थे। जामवंतजी ने उन्हें उनके बल का स्मरण कराया। बापू ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि गुरु और संत कई बार मनुष्य को उसकी भूली हुई क्षमता का बोध कराते हैं।
लंका में सीता से मिले हनुमान
हनुमानजी समुद्र पार कर लंका पहुंचे। वहां विभीषण से भेंट के बाद अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन किए। उन्होंने सीता को श्रीराम की मुद्रिका दी। बापू ने स्पष्ट किया कि हनुमानजी का उद्देश्य लंका जलाना नहीं था। त्रिजटा के स्वप्न के प्रसंग के बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि लंका दहन हुआ।
माता सीता ने हनुमानजी को चूड़ामणि दी, जिसे लेकर वह वापस श्रीराम के पास पहुंचे और उन्हें पूरा समाचार बताया। प्रभु ने हनुमानजी को हृदय से लगा लिया। बापू ने इस प्रसंग को सेवा और समर्पण का उदाहरण बताते हुए कहा कि हनुमानजी की सेवा का ऋण श्रीराम के लिए भी चुकाना संभव नहीं।
रामेश्वरम स्थापना तक कथा
कथा इसके बाद लंका पर चढ़ाई और रामेश्वरम स्थापना के प्रसंग तक पहुंची। इन प्रसंगों के माध्यम से बापू ने सेवा, त्याग, प्रेम, मर्यादा और समर्पण के भावों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि रामकथा के पात्रों का जीवन मनुष्य को अपने आचरण पर विचार करने का अवसर देता है।
बुधवार को अंतिम दिन की कथा
मोरारी बापू ने घोषणा की कि कथा के अंतिम दिन बुधवार को सुबह नौ बजे से आयोजन शुरू होगा और करीब दोपहर 12 बजे विश्राम होगा।
