आगरा के 39 में से 22 सेंसरों पर बढ़ा PM2.5, प्रदूषण के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल
आईएसबीटी पर PM2.5 का औसत स्तर 8.54 से बढ़कर 555.37 दर्ज
पांच प्रमुख स्थानों पर रिपोर्ट में ‘रीडिंग इश्यू’; केसी जैन ने सात दिन में
सेंसरों के ऑडिट और 30 दिन में कार्रवाई की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की
आगरा। ताजनगरी की हवा में प्रदूषण कितना है, इसका पता लगाने के लिए लगाए गए नगर निगम के वायु निगरानी सेंसरों के आंकड़ों ने नई चिंता खड़ी कर दी है। नगर निगम आगरा के 39 सेंसरों से जनवरी से मई 2026 तक दर्ज PM2.5 के औसत स्तर की तुलना पिछले साल के इन्हीं महीनों से की गई।https://www.upecp.in/
इसमें 22 स्थानों पर PM2.5 का औसत स्तर बढ़ा मिला, जबकि 17 स्थानों पर इसमें गिरावट दर्ज की गई। वहीं, कई सेंसरों की रीडिंग में ऐसी विसंगतियां सामने आई हैं, जिनसे निगरानी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
पर्यावरण कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन ने नगर निगम और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सेंसरों की तकनीकी जांच कराने की मांग की है। उन्होंने सात दिन के भीतर सभी 39 सेंसरों का स्वतंत्र विशेषज्ञ संस्था से ऑडिट शुरू कराने और 30 दिन में कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक करने को कहा है।
आईएसबीटी पर 8.54 से बढ़कर 555.37 पहुंचा स्तर
जनवरी से मई 2026 के औसत आंकड़ों में आईएसबीटी पर PM2.5 का स्तर पिछले साल के 8.54 से बढ़कर 555.37 दर्ज किया गया। शहीद नगर एवं वैभव नगर में यह 19.10 से बढ़कर 260.57 हो गया। धूलियागंज में इस साल औसत स्तर 232.72 दर्ज हुआ, हालांकि पिछले साल यह 377 था।https://todaynewstrack.com/2026/10/agra-up-news-air-quality-questions-pollution-sensors-showing-999-and-zero/
ईदगाह चौराहे पर PM2.5 का औसत स्तर 8.83 से बढ़कर 227.31 और दिल्ली गेट स्थित अग्रसेन मूर्ति पर 17.26 से बढ़कर 213.37 दर्ज किया गया। आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन पर यह 23.50 से बढ़कर 198.86 पहुंच गया। यहां जनवरी में रीडिंग 597 दर्ज हुई थी।
नया पुल तिराहे पर औसत स्तर 119.87 रहा, जबकि जनवरी में यह 389 तक पहुंचा था। आरओबी चौराहे पर स्तर लगभग दोगुना होकर 90.06 दर्ज किया गया। बाग फरजाना में औसत स्तर 84.96 और स्पीड कलर लैब पर 81.36 रहा।
इन आंकड़ों में कई स्थानों पर दर्ज स्तर काफी ऊंचे हैं। हालांकि, सेंसरों की रीडिंग पर उठे सवालों को देखते हुए इन आंकड़ों की तकनीकी पुष्टि जरूरी है। बस अड्डों, रेलवे स्टेशन, भीड़भाड़ वाले चौराहों और भारी यातायात वाले क्षेत्रों में वाहनों का धुआं, सड़क की धूल और खुले में कूड़ा जलाना प्रदूषण के संभावित स्रोत हो सकते हैं। वास्तविक कारणों की पुष्टि के लिए मौके पर जांच आवश्यक है।https://cpcb.gov.in
क्या है PM2.5 और क्यों है खतरनाक?
PM2.5 हवा में मौजूद 2.5 माइक्रोमीटर या उससे छोटे कणों को कहा जाता है। ये बेहद बारीक होते हैं और सांस के साथ फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं। इनके संपर्क में आने से दमा, खांसी, सांस लेने में परेशानी और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है।
भारत सरकार के निर्धारित मानकों के अनुसार PM2.5 की वार्षिक औसत सीमा 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 24 घंटे की औसत सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इसलिए निगरानी में दर्ज आंकड़ों की सही माप, माप की इकाई और सेंसरों की कार्यक्षमता की पुष्टि महत्वपूर्ण है।
सर्दियों में बढ़ती है चिंता
महीनेवार आंकड़ों के मुताबिक जनवरी और फरवरी में कई स्थानों पर PM2.5 का स्तर अधिक रहा। अप्रैल और मई तक अधिकांश स्थानों पर इसमें गिरावट दर्ज की गई। ऐसे में सर्दियों से पहले अक्टूबर और नवंबर में प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण और निगरानी उपकरणों की जांच जरूरी हो जाती है।
999 तक की रीडिंग और शून्य आंकड़ों ने उठाए सवाल
सेंसरों के आंकड़ों की जांच में कई ऐसी विसंगतियां सामने आई हैं, जिनकी तकनीकी पड़ताल जरूरी है। कई सेंसरों पर अधिकतम रीडिंग 990 से 999 के बीच बार-बार दर्ज हुई। ऐसी रीडिंग उपकरण की अधिकतम माप सीमा, तकनीकी खराबी या अन्य डेटा संबंधी समस्या का संकेत हो सकती है। इसकी पुष्टि उपकरणों की जांच से ही होगी।
वर्ष 2026 में पांच स्थानों पर कुल नौ बार रीडिंग शून्य दर्ज हुई। आगरा जैसे शहरी क्षेत्र में ऐसी रीडिंग को बिना जांच के वास्तविक प्रदूषण स्तर नहीं माना जा सकता। यह सेंसर के बंद होने, डेटा उपलब्ध नहीं होने या किसी तकनीकी समस्या से जुड़ी हो सकती है।
आंकड़ों में एक और विसंगति ईदगाह चौराहे पर सामने आई। यहां मई 2026 की रीडिंग 996.44 दर्ज है, जो मई 2024 की रीडिंग से हूबहू मेल खाती है। इसी तरह नौ स्थानों पर वर्ष 2026 के कम से कम तीन महीनों के आंकड़े वर्ष 2024 के आंकड़ों के समान पाए गए।
रिपोर्ट में संजय टॉकीज पर प्रदूषण में 234 प्रतिशत और पृथ्वीनाथ फाटक पर 101 प्रतिशत वृद्धि दर्ज होने के बावजूद टिप्पणी में ‘Improved’ यानी सुधार लिखा गया। इसके अलावा मूल तालिका में माप की इकाई का उल्लेख नहीं है। रिपोर्ट में पांच प्राथमिक स्थलों—आईएसबीटी, शहीद नगर, ईदगाह, दिल्ली गेट और फोर्ट स्टेशन—के सामने स्वयं ‘Reading Issue’ दर्ज किया गया है।
नगर निगम के सेंसर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निगरानी से अलग
ये 39 सेंसर नगर निगम आगरा के बताए गए हैं। इन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) या केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा लगाए गए उपकरण नहीं बताया गया है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की मानक निगरानी व्यवस्था से इन सेंसरों के आंकड़ों का मिलान करना जरूरी है। नियमित अंशांकन, रखरखाव और डेटा की गुणवत्ता की जांच से ही यह पता चल सकेगा कि रीडिंग कितनी विश्वसनीय है। सेंसरों पर सार्वजनिक धन खर्च हुआ है, इसलिए उनकी कार्यक्षमता और गलत आंकड़े दर्ज होने की स्थिति में जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
सात दिन में ऑडिट, 30 दिन में सार्वजनिक रिपोर्ट की मांग
के.सी. जैन ने नगर निगम के सभी 39 सेंसरों का सात दिन के भीतर स्वतंत्र विशेषज्ञ संस्था से तकनीकी ऑडिट शुरू कराने की मांग की है। इसमें सेंसरों के अंशांकन रिकॉर्ड, रखरखाव अनुबंध और डेटा लॉग की जांच शामिल होनी चाहिए।
उन्होंने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से दस प्राथमिक स्थलों पर अपने मानक उपकरणों से स्वतंत्र मापन कराने और नगर निगम के आंकड़ों से उसका मिलान सार्वजनिक करने को कहा है।
उनकी मांग है कि जांच पूरी होने की प्रतीक्षा किए बिना सड़क की धूल, खुले में कूड़ा जलाने, निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल और यातायात जाम से जुड़े प्रदूषण पर नियंत्रण के कदम जारी रहें। इसके लिए नगर निगम, यातायात पुलिस, परिवहन विभाग और रेलवे की संयुक्त भूमिका जरूरी बताई गई है।
उन्होंने 30 दिन में कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक करने और प्रत्येक सेंसर का डेटा माप की इकाई तथा वैध डेटा प्रतिशत के साथ जनता के लिए उपलब्ध कराने की मांग भी की है।
‘साफ हवा जीवन के अधिकार का हिस्सा’
पर्यावरण कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन ने कहा कि साफ हवा कोई सुविधा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक के जीवन के अधिकार का हिस्सा है। आगरा ताज ट्रेपेजियम जोन में आता है, जहां प्रदूषण की निगरानी का विशेष महत्व है। इसके बावजूद सेंसरों के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठना गंभीर विषय है।
उन्होंने कहा कि सेंसर नगर निगम ने लगाए हैं, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नहीं। ऐसे में नगर निगम को बताना चाहिए कि इनका अंशांकन कब हुआ, रखरखाव कौन करता है और गलत रीडिंग सामने आने पर अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। जिस सेंसर की रीडिंग पिछले साल के आंकड़ों से हूबहू मेल खाती हो या जो महीनों तक शून्य दिखाए, उसके आधार पर जनता के स्वास्थ्य से जुड़े फैसले नहीं लिए जाने चाहिए।
जैन ने नगर आयुक्त और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सात दिन के भीतर सभी सेंसरों का ऑडिट शुरू कराने की मांग दोहराई। उन्होंने आईएसबीटी, फोर्ट स्टेशन, दिल्ली गेट, ईदगाह, धूलियागंज और नया पुल जैसे स्थानों पर धूल और धुएं को नियंत्रित करने के लिए तत्काल कदम उठाने की बात कही।
उन्होंने कहा कि सर्दियों में जनवरी के दौरान हवा की स्थिति हर साल चिंता का विषय बनती है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर इसका असर पड़ सकता है। जरूरत पड़ने पर इस विषय को उचित न्यायिक मंच पर भी उठाया जाएगा।
यदि आंकड़े सही हैं तो शहर के कई हिस्सों में प्रदूषण का स्तर गंभीर चिंता का विषय है। यदि आंकड़ों में तकनीकी गड़बड़ी है तो निगरानी व्यवस्था जनता को हवा की वास्तविक स्थिति बताने में सक्षम नहीं है। इसलिए सेंसरों की स्वतंत्र जांच, मानक उपकरणों से आंकड़ों का मिलान और जवाबदेही तय करना जरूरी है।

