कृष्ण आश्रय हैं तो राधा अश्रु हैं’, मोरारी बापू ने कहा—भक्ति में करुणा की पुकार हो तो प्रभु तक पहुंचना निश्चित
आगरा। फतेहाबाद रोड स्थित जेपी वेडिंग ग्राउंड में करुणानिधान परिवार की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के चतुर्थ दिवस गुरुवार को भक्ति, प्रेम और करुणा का अनूठा संगम देखने को मिला। कथा व्यास मोरारी बापू ने ‘मानस ऋषि पंचमी’ के अंतर्गत श्रीरामचरितमानस के ऋषि-मुनियों को प्रणाम करते हुए कथा का शुभारंभ किया। कथा के बीच बापू ने जब राधा नाम की धुन छेड़ी तो पूरा पंडाल राधे-राधे के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से राधा नाम का संकीर्तन किया। भक्ति के इस भाव में कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
मोरारी बापू ने कहा कि कृष्ण आश्रय हैं तो राधा अश्रु हैं। जब जीवन में मनुष्य स्वयं को अकेला महसूस करता है और भीतर से करुणा की पुकार निकलती है, तब राधा नाम का स्मरण उसे भाव और प्रेम से जोड़ता है। उन्होंने राधा को जगदंबा और श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति बताते हुए कहा कि राधा नाम में ऐसी भाव शक्ति है, जो भक्त को भगवान से जोड़ती है। बापू ने कहा कि सच्चे मन से की गई पुकार में इतनी शक्ति होती है कि भगवान अपने भक्त की ओर दौड़े चले आते हैं।
‘मानस ऋषि पंचमी’ के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि अलग-अलग कालखंडों में ऋषि-मुनियों की विचारधारा और साधना की पद्धति अलग रही, लेकिन उनका मूल उद्देश्य मनुष्य को उसके मूल तत्व और परमात्मा तक पहुंचाना रहा। आत्मबोध और परमात्मा से मिलन उनकी साधना का अंतिम लक्ष्य रहा है। उन्होंने प्रारब्ध को भी जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष बताते हुए कहा कि भविष्य और प्रारब्ध अपनी गति से चलते हैं। अयोध्याकांड में वशिष्ठ ने भरत को समझाया था कि हरि की इच्छा ही बलवान है।
कथा परंपरा का उल्लेख करते हुए बापू ने कहा कि पुराने समय में कथाकार अपनी प्रस्तुतियों में बड़ी संख्या में श्लोक और चौपाइयों का वाचन करते थे। समय के साथ इनकी संख्या कम हुई है, लेकिन कथा का मूल भाव आज भी वही है। उन्होंने कहा कि रामचरितमानस के वक्ता साधु-भाव से जुड़े होते हैं और साधुता का आधार विवेक है। कथा केवल शब्दों का वाचन नहीं, बल्कि जीवन को सही दृष्टि देने का माध्यम भी है।
भगवान की कृपा के प्रसंग पर उन्होंने कहा कि कृपा किसी एक वर्ग या केवल भक्तों तक सीमित नहीं है। श्रीराम ने रावण का वध किया, लेकिन उसे परमधाम की प्राप्ति हुई, इसे भी प्रभु की कृपा के रूप में देखा जा सकता है। युद्ध के बाद श्रीराम ने इंद्र से वानर सेना को पुनर्जीवन देने का वर मांगा। उनकी कृपा केवल अपनी सेना तक सीमित नहीं रही, बल्कि रावण की सेना पर भी हुई।
बापू ने रामकथा के प्रति अपने भाव को व्यक्त करते हुए कहा कि यदि एक जन्म में रामकथा गाने का अवसर न मिले तो वे अनेक जन्मों तक रामकथा गाएंगे। उन्होंने कहा कि लोगों से उनका संबंध केवल पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रेम और भाव का रिश्ता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से भी रामकथा के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े रहने का आह्वान किया।
बच्चों के हाथों में मोबाइल देने को लेकर भी बापू ने अभिभावकों को सजग किया। उन्होंने कहा कि बच्चे स्वभाव से चंचल और जिज्ञासु होते हैं। ऐसे में उन्हें मोबाइल दिया जाए तो अभिभावकों को उसकी सामग्री पर ध्यान देना चाहिए, ताकि बच्चों के मन और संस्कारों पर विपरीत प्रभाव न पड़े। तकनीक का इस्तेमाल विवेक के साथ करने की जरूरत है।
बापू ने गुजरात के लोगों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके जीवन में गुजरात के लोगों का विशेष योगदान और आशीर्वाद रहा है। उन्होंने आगरा के गुजराती समाज का भी आभार जताया। उन्होंने बताया कि गुजराती समाज के अध्यक्ष सतीश शाह के आग्रह पर उन्होंने जतीपुरा, गोवर्धन में कथा करने की स्वीकृति दी है। कथा की तिथि बाद में निर्धारित की जाएगी।
कथा के दौरान श्रद्धालुओं की प्रश्न-पत्रियों का उत्तर देते हुए बापू ने सुंदरकांड के नाम की व्याख्या भी की। उन्होंने बताया कि सुंदरकांड में ‘सुंदर’ शब्द नौ बार आता है और नौ का अंक पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद कथा शिव-सती विवाह और सती त्याग के प्रसंग की ओर बढ़ी। इन प्रसंगों के बीच एक बार फिर राधे-राधे का संकीर्तन हुआ और पूरा पंडाल भक्तिभाव से भर गया।
राधा नाम के महत्व को बताते हुए बापू ने कहा कि राधा नाम फल नहीं, रस है। भगवान श्रीकृष्ण फल की इच्छा पूरी कर सकते हैं, जबकि श्रीराधा का नाम शाश्वत रस प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में राधा-कृष्ण के प्रेम और मिलन का विशेष स्थान है। रामकथा में रामनाम का जाप भी मनुष्य को उसी परम प्रेम की अनुभूति की ओर ले जाता है।
बापू ने तुलसीदास की पंक्ति ‘एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास’ का स्मरण कराते हुए कहा कि जब मनुष्य का भरोसा भगवान पर हो जाता है तो भय कम होने लगता है। उन्होंने सुग्रीव के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रीराम ने उन्हें अपने बल पर भरोसा रखने और चिंता छोड़कर निर्भय होने का संदेश दिया था।
मोरारी बापू की कथा सुनने के लिए गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र समेत विभिन्न प्रदेशों से श्रद्धालु पहुंचे हैं। आयोजकों के अनुसार रोजाना करीब दो से तीन हजार लोग कथा में शामिल हो रहे हैं। कथा सुनने के बाद श्रद्धालु आसपास के पर्यटन स्थलों का रुख कर रहे हैं। इससे स्थानीय स्तर पर ऑटो चालकों, दुकानदारों और अन्य कारोबारियों को काम मिल रहा है। कथा स्थल के बाहर विभिन्न तरह के स्टॉल भी लगाए गए हैं। धार्मिक आयोजन के साथ बड़ी संख्या में बाहर से आए लोगों की मौजूदगी से स्थानीय कारोबार और रोजगार गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल रहा है।
