आगरा। शरद पूर्णिमा पर नाई की मंडी स्थित प्रेमनिधि मंदिर में ठाकुरजी के महारास के भाव से जुड़ा विशेष श्रृंगार और दर्शन आयोजित किए गए। श्वेत डोरिया के वस्त्रों, सुनहरी-चांदी की जरी और हीरे-मोती के आभूषणों से सजे ठाकुरजी ने वैणु धारण कर भक्तों को मनोहारी दर्शन दिए। मंदिर की श्वेत सज्जा, महारास के भाव वाली पिछवाई, हवेली संगीत में रास के पदों का गायन और विशेष भोग सेवा ने पूरे आयोजन को कृष्ण भक्ति के रंग में रंग दिया।
पुष्टिमार्गीय परंपरा में शरद पूर्णिमा को रासोत्सव अथवा रास पूनम के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के महारास की स्मृति और उनके दिव्य प्रेम के भाव को समर्पित है। इसी परंपरा के अनुरूप प्रेमनिधि मंदिर में ठाकुरजी की सेवा, श्रृंगार और भोग की विशेष व्यवस्था की गई। दर्शन के दौरान श्वेत वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित प्रभु की छवि ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।https://todaynewstrack.com/2026/10/sharad-purnima-premnidhi-temple-agra-maharas-darshan/
सेवायत हरिमोहन गोस्वामी और सुनीत गोस्वामी ने बताया कि शरद पूर्णिमा पुष्टिमार्गीय सेवा परंपरा में विशेष महत्व रखती है। इस दिन ठाकुरजी का अलग स्वरूप में श्रृंगार किया जाता है। श्वेत डोरिया के वस्त्रों पर जरी की कारीगरी, हीरे-मोती के आभूषण और विशेष मुकुट इस सेवा का हिस्सा हैं। ठाकुरजी वैणु धारण कर भक्तों को दर्शन देते हैं। इस दिन उनकी शयन सेवा नहीं होती।

मंदिर में केवल ठाकुरजी का श्रृंगार ही नहीं, बल्कि पूरे सेवा स्थल की सज्जा भी उत्सव के अनुरूप की गई। श्वेत वस्त्रों से सेवा स्थल को सजाया गया। द्वारों पर हल्दी से ड्योढ़ी बनाई गई और अशोक के पत्तों की बंदरवाल लगाई गई। इन पारंपरिक सजावटों के बीच महारास के भाव वाली पिछवाई ने मंदिर के वातावरण को कृष्णमय बना दिया।
शरद पूर्णिमा के अवसर पर ठाकुरजी की सेवा में भोग का भी विशेष महत्व रहा। भोग सेवा में केसरयुक्त बासोदी यानी खीर अर्पित की गई। इसके साथ राजभोग और मनोर की व्यवस्था रही।
मनोर में फैनी, गुजिया, कचौरी, दही-बड़ा, पेड़ा, बर्फी, खट्टे-मीठे दही, दूध-पूरी, विभिन्न प्रकार के फल और तली हुई मेवा शामिल की गई। पर्व की परंपरा के अनुसार तैयार किए गए इन व्यंजनों को ठाकुरजी को समर्पित किया गया।
मंदिर में हवेली संगीत के माध्यम से भी महारास के भाव को प्रस्तुत किया गया। गायकों ने रास के पदों का गायन किया। पुष्टिमार्गीय परंपरा में शरद पूर्णिमा के इस उत्सव के दौरान संगीत और पद गायन का अपना विशेष स्थान है।
सेवायतों के अनुसार इस दिन ‘मान’ एवं ‘पोढ़वे’ के पदों का गायन नहीं किया जाता। इस तरह श्रृंगार, भोग, सज्जा और संगीत के माध्यम से उत्सव की धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया गया।http://sharad-purnima-agra-premnidhi-temple-thakurji-darshan
शरद पूर्णिमा पर प्रेमनिधि मंदिर में हुई सेवा के प्रत्येक पक्ष में श्वेत रंग की विशेषता दिखाई दी। ठाकुरजी के परिधान से लेकर मंदिर की सजावट तक, सभी व्यवस्थाएं पर्व के अनुरूप रखी गईं।
वैणु धारण किए प्रभु के दर्शन और महारास की झलक देती पिछवाई ने आयोजन को विशिष्ट स्वरूप दिया। पुष्टिमार्गीय रीति के अनुसार किए गए श्रृंगार और भोग के साथ श्रद्धालुओं को पर्व की परंपरा से जुड़ने का अवसर मिला।
इस अवसर पर आशीष पचौरी, सरदार सिंह धाकड़, सोनू गुप्ता, श्यामजी शिवहरे, हर्ष गुप्ता, राजेश धाकड़ और रानू पचौरी सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
