सार
सड़क निर्माण में गड़बड़ी, जलभराव और समय पर मरम्मत न होने से जनता को परेशानी न झेलनी पड़े, इसके लिए के. सी. जैन ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कई सुझाव रखे हैं।
इनमें ठेका देने से पहले जलनिकासी प्रमाणपत्र, सड़क की उम्र और गारंटी सार्वजनिक करने, गूगल मानचित्र पर निर्माण से लेकर खर्च तक का हिसाब उपलब्ध कराने और शिकायतों पर 15 कार्यदिवस में कार्रवाई की व्यवस्था शामिल है।
जैन ने सड़क की गुणवत्ता खराब होने पर जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने, जलनिकासी पूरी होने के बाद ही अंतिम भुगतान करने और केंद्र व राज्यों के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाने का सुझाव दिया है।http://todaynewstrack.com
आगरा। सड़क बनाने, चौड़ा करने, मजबूत करने, दोबारा डामर बिछाने या नियमित मरम्मत का ठेका देने से पहले यह स्पष्ट करना होगा कि बारिश का पानी कहां जाएगा। के. सी. जैन का सुझाव है कि निविदा जारी करने, कार्यादेश देने या काम शुरू करने से पहले सक्षम अभियंता से जलनिकासी प्रमाणपत्र लिया जाए।
मौके की जांच के बाद इसमें बताया जाए कि पानी निकलने की पर्याप्त व्यवस्था पहले से मौजूद है या इसे बनाने की स्वीकृत योजना, बजट और समयसीमा सड़क के काम में शामिल है। बाद में नाली बनाने का आश्वासन पर्याप्त नहीं माना जाए।https://todaynewstrack.com/2026/10/up-news-supreme-court-road-construction-drainage-contractor-accountability/
प्रमाणपत्र में सड़क की ढाल, निचले हिस्सों, नालियों, पुलियों और पानी के अंतिम निकास का विवरण हो। जहां नाली जरूरी है, वहां पानी निकलने की व्यवस्था के बिना उसे पूरा इंतजाम न माना जाए। सड़क और नाली अलग-अलग विभागों के अधीन होने पर उनकी जिम्मेदारी पहले तय हो। निर्माण की शर्तों और लागत में जलनिकासी शामिल रहे। पानी निकालने की व्यवस्था चालू होने से पहले डामर की अंतिम परत न बिछाई जाए। सड़क ऊंची या चौड़ी करते समय पानी निकलने के पुराने रास्ते भी बंद न हों।
जैन ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक जलनिकासी प्रमाणपत्र की व्यवस्था उनका नया सुझाव है। इसका उद्देश्य मौजूदा सड़क निर्माण मानकों का पालन सुनिश्चित करना है। इसे भारतीय सड़क कांग्रेस (आईआरसी) की ऐसी अनिवार्य शर्त के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है, जो पहले से हर सड़क पर समान रूप से लागू हो।

नाली बने तो सफाई और मरम्मत की जिम्मेदारी भी तय हो
सड़क पर जलभराव रोकने के लिए नाली बनाना ही काफी नहीं है। नालियों, पानी के प्रवेश स्थानों, पुलियों और निकास मार्गों से गाद, कचरा और घास नियमित रूप से हटाई जाए। बारिश से पहले, बारिश के बाद और भारी वर्षा होने पर जांच हो। सफाई की तारीख, तस्वीर, जिम्मेदार अधिकारी और खर्च का रिकॉर्ड रखा जाए। निकाला गया मलबा ऐसी जगह न छोड़ा जाए, जहां से वह अगली बारिश में फिर नाली में पहुंच जाए।
जहां बार-बार जलभराव होता है, वहां कारण की जांच कर तय समयसीमा में स्थायी समाधान किया जाए। सड़क की नियमित जांच और मरम्मत पूरी करने की समयसीमा भी निर्धारित हो। कार्यस्थल पर ठेकेदार और निगरानी करने वाले अभियंता का नाम, संपर्क नंबर और काम पूरा करने की तारीख वाला बोर्ड लगाया जाए। हर तीन महीने में सड़क की खराबियों, शिकायतों और मरम्मत की समीक्षा की जाए।
सड़क कितने साल चलेगी, गारंटी भी सार्वजनिक हो
हर निर्माण और मरम्मत के ठेके में बताया जाए कि सड़क कितने साल तक उपयोग योग्य रहने के लिए बनाई गई है और कितनी अवधि तक गड्ढे भरने, दोबारा सतह बिछाने या पुनर्निर्माण की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। इसके साथ ठेकेदार की गारंटी अवधि अलग से दर्ज हो। सड़क की घोषित उपयोगी उम्र और गारंटी कब शुरू होगी और कब समाप्त, इसकी जानकारी भी सार्वजनिक की जाए।https://www.supremecourtcases.com/in-re-phalodi-accident-v-national-highways-authority-of-india-and-others/?utm_source=chatgpt.com

सड़क निर्धारित अवधि से पहले खराब होने पर उसके डिजाइन, निर्माण सामग्री, गुणवत्ता और रखरखाव की जांच हो। इसके बाद जिम्मेदार ठेकेदार, सलाहकार, अधिकारी या संस्था की भूमिका तय की जाए। कानून और अनुबंध के अनुसार मरम्मत का खर्च जिम्मेदार पक्ष से वसूला जाए। नया मरम्मत बजट मंजूर कर देने से पुराने निर्माण की खामियों की जवाबदेही खत्म न हो। नालियों की सफाई और सड़क के नियमित रखरखाव की व्यवस्था भी जारी रहे।
गूगल मानचित्र पर सड़क छूते ही खुलेगा निर्माण का पूरा हिसाब
जैन ने प्रत्येक सड़क खंड और उस पर हुए निर्माण या मरम्मत कार्य को अलग पहचान देकर गूगल मानचित्र से जुड़े सार्वजनिक नक्शे पर दर्ज करने का सुझाव दिया है। नागरिक मोबाइल पर सड़क या उसके चिह्न को छूकर पूरा रिकॉर्ड देख सकेंगे। इसके लिए किसी खाते में प्रवेश करने की जरूरत नहीं होगी। काम स्वीकृत होने के साथ रिकॉर्ड दर्ज किया जाए और निर्माण की प्रगति, काम पूरा होने, गुणवत्ता जांच तथा मरम्मत के बाद उसे अद्यतन किया जाए।
रिकॉर्ड में सड़क की लंबाई, स्वीकृत काम, मंजूर बजट, ठेके की रकम, वास्तविक खर्च, ठेकेदार और अभियंता का नाम तथा काम शुरू होने और पूरा होने की निर्धारित और वास्तविक तारीख दर्ज हो। निर्माण सामग्री की गुणवत्ता जांच, जलनिकासी प्रमाणपत्र, सड़क की घोषित उपयोगी उम्र, गारंटी और पिछली मरम्मत का विवरण भी उपलब्ध कराया जाए।
स्वीकृतियों, प्रमाणपत्रों और तस्वीरों को ऑनलाइन देखा जा सके और उनकी प्रतियां प्राप्त की जा सकें। मूल अभिलेख संबंधित सरकारी संस्था के पास रहें और उसकी सार्वजनिक वेबसाइट पर भी उपलब्ध हों।
शिकायत पर नंबर मिले, 15 कार्यदिवस में कार्रवाई नहीं तो मामला आगे पहुंचे
गड्ढों और जलभराव की शिकायत के लिए वेबसाइट, निःशुल्क दूरभाष नंबर, व्हाट्सऐप और लिखित आवेदन की सुविधा हो। सार्वजनिक नक्शे पर स्थान चिह्नित कर तस्वीर के साथ शिकायत दर्ज की जा सके। हर शिकायत का नंबर मिले और उसके आधार पर कार्रवाई की स्थिति देखी जा सके। मरम्मत पूरी होने पर उसकी तस्वीर शिकायतकर्ता को भेजी जाए।
यदि 15 कार्यदिवस में शिकायत पर कार्रवाई नहीं होती है, तो उसे राज्य के नामित वरिष्ठ समन्वय विभाग या संस्था तक पहुंचाने की व्यवस्था हो। इन सुविधाओं का अखबारों और अन्य माध्यमों से प्रचार भी किया जाए, ताकि नागरिकों को शिकायत दर्ज कराने और कार्रवाई की जानकारी प्राप्त करने का तरीका पता हो।
जलनिकासी पूरी होने पर ही अंतिम बिल का भुगतान हो
जैन का सुझाव है कि स्वीकृत जलनिकासी व्यवस्था की मौके पर जांच होने तक सड़क का काम पूरा होने का प्रमाणपत्र जारी न किया जाए और अंतिम भुगतान भी न हो। हर साल बारिश से पहले व्यवस्था के चालू होने की पुष्टि की जाए। इसके अलावा नमूना जांच भी कराई जाए, ताकि कागजों पर दर्ज व्यवस्था और मौके की वास्तविक स्थिति का अंतर सामने आ सके।
गलत प्रमाणपत्र देने, सफाई में लापरवाही या सड़क समय से पहले टूटने के मामलों की जांच कर उचित प्रक्रिया के तहत विभागीय और अनुबंध संबंधी कार्रवाई हो। सड़क की खराबी या जलभराव से प्रभावित व्यक्ति को कानून के अनुसार मिलने वाला मुआवजा विभागों और ठेकेदार के बीच जिम्मेदारी के विवाद के कारण नहीं रोका जाए।
60 दिन में बने प्रारूप, 90 दिन में आए शुरुआती रिपोर्ट
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय राज्यों के साथ मिलकर 60 दिन में जलनिकासी प्रमाणपत्र, सड़क की उपयोगी उम्र और कामकाज की साझा व्यवस्था का प्रारूप तैयार करे। राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की ओर से शुरुआती पालन प्रतिवेदन 90 दिन में प्रस्तुत किया जाए। इसके बाद हर तीन महीने में प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक हो।
सड़क के रिकॉर्ड को सार्वजनिक नक्शे पर उपलब्ध कराने का काम भी चरणबद्ध समयसीमा में पूरा किया जाए। नालियों की सफाई, गड्ढे भरने और एक ही सड़क पर बार-बार मरम्मत कराने का खर्च अलग-अलग दिखाया जाए, ताकि अनावश्यक दोहराव और जनता के पैसे के इस्तेमाल का हिसाब सामने आ सके।
इन व्यवस्थाओं के दौरान तत्काल खतरा दूर करने का काम नहीं रुकना चाहिए। खतरनाक गड्ढों की अस्थायी मरम्मत, बैरिकेड लगाने, चेतावनी संकेत लगाने और बंद नाली की आपात सफाई तुरंत की जाए। इसके बाद जहां जरूरत हो, जलनिकासी का स्थायी समाधान तय समयसीमा में पूरा किया जाए।
के. सी. जैन ने कहा, “मेरी चिंता उन परिवारों की है, जिनका कोई अपना सड़क के गड्ढे के कारण घर वापस नहीं लौटता या घायल होकर लंबे समय तक तकलीफ झेलता है। सुरक्षित सड़क और समय पर मरम्मत हर नागरिक की जरूरत है। मैं चाहता हूं कि सड़क बनाने से पहले पानी निकलने का इंतजाम सुनिश्चित हो, सड़क कितने साल चलेगी यह बताया जाए और जनता को हर काम का हिसाब आसानी से मिले। जहां लापरवाही साबित हो, वहां जिम्मेदारी तय हो और पीड़ित परिवार को मुआवजे के लिए भटकना न पड़े। जनता के पैसे से बनने वाली सड़क पर उसकी सुरक्षा और उसके पैसे की पूरी जवाबदेही होनी चाहिए। इन्हीं उद्देश्यों से मैं माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ये सुझाव रख रहा हूं।”
आगरा में आठ माह में 834 सड़क हादसे, 487 लोगों की मौत
आगरा जिले में जनवरी से अगस्त 2026 तक 834 सड़क हादसों में 487 लोगों की मौत हुई। सड़क की श्रेणी के अनुसार अंदरूनी सड़कों पर सबसे अधिक 343 हादसे हुए, जिनमें 173 लोगों की जान गई। राष्ट्रीय राजमार्गों पर 230 हादसों में 149 मौतें, राज्य राजमार्गों पर 117 हादसों में 77 मौतें, प्रमुख जिला सड़कों पर 77 हादसों में 43 मौतें और ग्रामीण सड़कों पर 45 हादसों में 24 मौतें दर्ज की गईं। एक्सप्रेसवे पर 22 हादसों में 21 लोगों की मौत हुई।
जनवरी से अगस्त 2025 की समान अवधि में जिले में 982 हादसों में 513 लोगों की मौत हुई थी। इस तरह 2026 की समान अवधि में हादसों में 148 और मृतकों की संख्या में 26 की कमी दर्ज की गई। इसके बावजूद अंदरूनी सड़कों पर हादसों और मौतों की संख्या सबसे अधिक रही।
सड़क सुरक्षा समिति की बैठकों में भी इन आंकड़ों की नियमित समीक्षा होनी चाहिए। संबंधित विभागों से सड़कवार हादसों, खराब सड़कों, जलभराव और बार-बार दुर्घटना होने वाले स्थानों की जानकारी लेकर सुधार की समयसीमा तय की जाए। अगली बैठक में यह भी देखा जाए कि पहले दिए गए निर्देशों पर कितना काम हुआ। सड़क की खामियों, संकेतकों, प्रकाश व्यवस्था और जलनिकासी में सुधार से दुर्घटनाओं का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है।
