आगरा में राजबब्बर हुए भावुक, बोले-नाना का जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति
बेहतरीन कलाकार के साथ करीबी मित्र भी खोया
आगरा। अभिनेता और आगरा के पूर्व सांसद राजबब्बर गुरुवार को जनकपुरी के कार्यक्रम में पहुंचे। इस दौरान अभिनेता नाना पाटेकर के निधन की चर्चा पर वह भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि नाना का जाना उनके लिए व्यक्तिगत क्षति और दुख है। उन्होंने एक बेहतरीन कलाकार, साथी और मित्र खो दिया।
नाना पाटेकर का पांच दशक से अधिक लंबा सफर रंगमंच से शुरू होकर हिंदी और मराठी सिनेमा तक पहुंचा। गंभीर भूमिकाओं से लेकर खलनायक और हास्य किरदारों तक उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। अभिनय के साथ सेना से जुड़ाव और किसानों के लिए सामाजिक काम भी उनके जीवन का अहम हिस्सा रहा।

1951 में महाराष्ट्र में हुआ जन्म
नाना पाटेकर का जन्म एक जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में विश्वनाथ पाटेकर के रूप में हुआ था। उनका बचपन आर्थिक परेशानियों के बीच बीता। उनके पिता कपड़ा पेंटिंग का काम करते थे और छोटा कारोबार चलाते थे। बचपन से ही नाना का रंगमंच की ओर झुकाव था। पिता भी उन्हें नाटक और तमाशे देखने ले जाते थे। बाद में उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट में पढ़ाई की और कुछ समय विज्ञापन एजेंसी में भी काम किया।
नाना ने एक पुराने साक्षात्कार में बताया था कि परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद किशोरावस्था में ही उन्हें काम करना पड़ा। वह स्कूल के बाद फिल्म पोस्टर बनाने का काम करते थे और उन्हें महीने के 35 रुपये मिलते थे। गरीबी और संघर्ष के उस दौर ने उनके व्यक्तित्व और अभिनय पर गहरा असर डाला। रंगमंच उनके लिए अभिनय सीखने का सबसे बड़ा माध्यम बना।http://Actor Nana Patekar passes away on Thursday
रंगमंच से मिली अभिनय की पहचान
नाना ने स्कूल के दिनों से ही नाटक करना शुरू कर दिया था। आगे चलकर वह मराठी रंगमंच से जुड़े और विजय मेहता समेत कई रंगकर्मियों के साथ काम किया। मंच पर उनकी आवाज, संवाद बोलने के अंदाज और अभिनय की अपनी शैली ने उन्हें अलग पहचान दी। फिल्मी दुनिया की चमक के बजाय वह लंबे समय तक रंगमंच को ही अपना मुख्य क्षेत्र मानते रहे।
अभिनेत्री स्मिता पाटिल से उनकी दोस्ती भी इसी दौर में हुई। स्मिता पाटिल पहले से फिल्मों में काम कर रही थीं और उन्होंने नाना को सिनेमा में आने के लिए प्रेरित किया। नाना शुरू में फिल्मों में जाने को लेकर उत्सुक नहीं थे, लेकिन स्मिता पाटिल के कहने पर उन्होंने फिल्मी दुनिया का रुख किया।
1978 में ‘गमन’ से फिल्मों में शुरुआत
नाना पाटेकर ने 1978 में मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ से बड़े पर्दे पर शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मों में छोटी और सहायक भूमिकाएं कीं। ‘आज की आवाज’अंकुश’ प्रतिघात’ अंधा युद्ध’ ‘आवाम’ मोहरे’ त्रिशाग्नि’ और ‘सलाम बॉम्बे जैसी फिल्मों ने उन्हें धीरे-धीरे पहचान दिलाई।
सलाम बॉम्बे में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली। इसके बाद 1989 में आई परिंदा ने उनके करियर को नई ऊंचाई दी। फिल्म में उन्होंने अन्ना नाम के खतरनाक गैंगस्टर का किरदार निभाया। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उनके अभिनय की खासियत यह रही कि वह किरदार को केवल संवादों से नहीं, बल्कि चेहरे के भाव, आवाज और ठहराव से भी प्रभावी बनाते थे।
क्रांतिवीर और अग्निसाक्षी से तीन राष्ट्रीय पुरस्कार
1994 में आई ‘क्रांतिवीर’ में नाना पाटेकर ने मुख्य भूमिका निभाई। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद 1996 की ‘अग्निसाक्षी’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इस तरह उनके खाते में तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार आए। भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए वर्ष 2013 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।
उन्होंने अभिनय के अलावा लेखन और निर्देशन में भी काम किया। ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ में उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन भी किया। ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘नटसम्राट’ और ‘द अटैक्स ऑफ 26/11’ जैसी फिल्मों में उनके गंभीर अभिनय को सराहना मिली। मराठी सिनेमा में भी उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया और ‘नटसम्राट’ उनके चर्चित किरदारों में शामिल रहा।
‘वेलकम’ में उदय शेट्टी बनकर बदला अंदाज
नाना पाटेकर की पहचान केवल गंभीर और गुस्सैल किरदारों तक सीमित नहीं रही। 2007 की ‘वेलकम’ में उन्होंने गैंगस्टर उदय शेट्टी का किरदार निभाया। उनका संवाद बोलने का अंदाज और कॉमेडी दर्शकों को खूब पसंद आई। इस किरदार ने उनकी अभिनय क्षमता का दूसरा पक्ष सामने रखा। वह ‘वेलकम बैक’ में भी उदय शेट्टी के रूप में नजर आए।http://Nana Patekar Death News Updates: Actor Gets State Funeral At Pune Farmhouse
इसके अलावा उन्होंने अलग-अलग दौर में चरित्र प्रधान भूमिकाएं कीं। गंभीर सामाजिक विषयों वाली फिल्मों से लेकर व्यावसायिक सिनेमा तक उन्होंने अपने किरदारों के साथ प्रयोग किया। यही वजह रही कि उनका नाम हिंदी और मराठी दोनों सिनेमा में अलग तरह के अभिनय के लिए पहचाना गया।
‘प्रहार’ के लिए ली सैन्य ट्रेनिंग
नाना पाटेकर का सेना से जुड़ाव भी उनके जीवन की खास कहानी रहा। ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ में सेना के अधिकारी की भूमिका निभाने के लिए उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ सैन्य प्रशिक्षण लिया। इसके बाद वह टेरिटोरियल आर्मी से जुड़े और उन्हें मानद लेफ्टिनेंट कर्नल का पद मिला।
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी उनका सेना से जुड़ाव सामने आया। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक वह करीब 60 दिन तक सेना के जवानों के साथ अग्रिम क्षेत्रों में रहे। इस दौरान उन्होंने क्विक रिएक्शन टीम के साथ भी समय बिताया। अभिनय की दुनिया में रहते हुए सेना से उनका यह जुड़ाव उनके जीवन का अलग पक्ष रहा।
किसानों की मदद के लिए बनाया ‘नाम फाउंडेशन’
नाना पाटेकर का जुड़ाव सामाजिक काम से भी रहा। महाराष्ट्र में किसानों की परेशानियों और आत्महत्या की घटनाओं ने उन्हें प्रभावित किया। वर्ष 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ ‘नाम फाउंडेशन’ शुरू किया। संस्था ने खास तौर पर सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों और उनके परिवारों की मदद के लिए काम किया।
नाना अस्पतालों में जाकर जरूरतमंदों और मरीजों की मदद भी चुपचाप करते थे। उनके करीबियों के अनुसार उनका स्वभाव सरल और सामाजिक था। फिल्मी सफलता के बावजूद उन्होंने अपने जीवन में सादगी बनाए रखी और ग्रामीण जीवन तथा किसानों से जुड़े रहे।
राजबब्बर बोले-नाना के साथ काम करने से बेहतर करने की मिलती थी प्रेरणा
जनकपुरी के कार्यक्रम में राजबब्बर ने नाना पाटेकर के साथ अपने पुराने रिश्ते को याद किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1982 में नाना के साथ उनका संपर्क हुआ था। इसके बाद दोनों ने ‘अंधा युद्ध’, ‘आज की आवाज’ और ‘आवाम’ जैसी फिल्मों में साथ काम किया।http://todaynewstrack.com
राजबब्बर ने कहा कि नाना बेहतरीन अभिनेता होने के साथ उनके करीबी मित्र भी थे। उनके साथ काम करने से बेहतर करने की प्रेरणा मिलती थी। राजबब्बर के मुताबिक सीन में नाना काफी स्पेस लेते थे और दर्शकों का ध्यान उनकी ओर चला जाता था। इसे लेकर दोनों के बीच नोकझोंक भी होती थी, लेकिन रिश्ते में आत्मीयता बनी रही।
उन्होंने नाना की अभिनय शैली और सादे व्यक्तित्व को याद करते हुए कहा कि नाना के जीवन के उतार-चढ़ाव की छाप उनके अभिनय में दिखाई देती थी। उनका स्वभाव सरल था और वह अस्पतालों में जाकर चुपचाप लोगों तथा मरीजों की मदद करते थे। राजबब्बर ने कहा कि नाना का जाना फिल्म जगत के साथ उनकी व्यक्तिगत क्षति भी है।
रात 2:30 बजे दोस्त को किया था संदेश
नाना पाटेकर के निधन से पहले के घंटों की जानकारी अस्पताल से जुड़े डॉक्टरों के हवाले से सामने आई है। डॉ. शेखर सालकर के अनुसार नाना ने रात करीब 2:30 बजे एक दोस्त को तबीयत ठीक नहीं लगने और सीने के बाईं ओर परेशानी की जानकारी दी थी। दोस्त ने कुछ समय बाद उनका संदेश देखा और करीब चार बजे उनके घर पहुंचा। उस समय नाना को काफी पसीना आ रहा था और उनकी हालत बिगड़ रही थी।
इसके बाद उनकी हालत और बिगड़ी और वह बेहोश होने लगे। केयरटेकर को अस्पताल भेजा गया और एंबुलेंस बुलाई गई। मेडिकल टीम जब घर पहुंची तो नाना नॉन-रिएक्टिव थे। टीम ने तत्काल सीपीआर शुरू किया और उन्हें मणिपाल अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में करीब 45 मिनट तक उन्हें बचाने की कोशिश की गई, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
75 साल की उम्र में थमा अभिनय का सफर
नाना पाटेकर का निधन आठ अक्टूबर 2026 को गोवा में 75 वर्ष की उम्र में हुआ। उन्हें घर पर अचेत अवस्था में पाया गया था। मणिपाल अस्पताल में डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित किया। अस्पताल के अनुसार मृत्यु का कारण कार्डियक अरेस्ट बताया गया है।
रंगमंच से शुरू हुआ उनका सफर ‘गमन’ से फिल्मों तक पहुंचा और ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘प्रहार’, ‘नटसम्राट’ और ‘वेलकम’ जैसे अलग-अलग मिजाज के किरदारों तक फैला। तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री उनके अभिनय की उपलब्धियों में शामिल रहे। सिनेमा के अलावा सेना से जुड़ाव और किसानों के लिए सामाजिक काम ने उनके व्यक्तित्व को पर्दे के बाहर भी अलग पहचान दी।
