2025 में 17 किमी की उड़ान से अब 21 किमी तक पहुंचा प्लेटफॉर्म,
20 किमी की ऊंचाई पर 30 मिनट से अधिक रहा
आगरा। रक्षा तकनीक के क्षेत्र में आगरा ने एक बार फिर देश के सामने अपनी ताकत दिखाई है। शहर स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट एडीआरडीई ने स्वदेशी उच्च ऊंचाई वाले प्लेटफॉर्म एचएपीएस के विकास में बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
डीआरडीओ के सफल उड़ान परीक्षण में प्लेटफॉर्म समुद्र तल से 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा और 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर 30 मिनट से अधिक समय तक बना रहा।
इसके बाद उसे जमीन पर वापस आने का निर्देश दिया गया और सिस्टम को सुरक्षित वापस प्राप्त कर लिया गया। इस उड़ान में वास्तविक समय का वीडियो, उड़ान से जुड़े आंकड़े और वाहन के अन्य पैरामीटर ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन तक पहुंचते रहे।
खास बात यह है कि आगरा की एडीआरडीई ने जिस प्रणाली को विकसित किया है, वह लंबे समय तक समताप मंडल में रहकर निगरानी करने वाले प्लेटफॉर्म के रूप में तैयार की जा रही है। यानी आगरा में तैयार तकनीक अब जमीन से कई किलोमीटर ऊपर लंबे समय तक काम करने वाली हवाई प्रणाली के रूप में आकार ले रही है।
17 किमी से 21 किमी तक पहुंचा आगरा का प्लेटफॉर्म
एचएपीएस के विकास में आगरा की एडीआरडीई ने एक साल में महत्वपूर्ण बढ़त हासिल की है। मई 2025 में हुए शुरुआती उड़ान परीक्षण में एडीआरडीई द्वारा विकसित स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप प्लेटफॉर्म करीब 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा था।

उस उड़ान की कुल अवधि करीब 62 मिनट रही थी। अब नए परीक्षण में यही विकास यात्रा 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच गई है।
इस बार प्लेटफॉर्म ने 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर 30 मिनट से अधिक समय तक अपनी स्थिति बनाए रखी। इससे साफ है कि परीक्षण केवल ऊंचाई हासिल करने तक सीमित नहीं रहा बल्कि इतनी ऊंचाई पर प्लेटफॉर्म को नियंत्रित रखने की क्षमता भी परखी गई।
आगरा में तैयार हुईं ये तकनीकें
एचएपीएस हवा से हल्की प्रणाली है। इसे समताप मंडल में लंबे समय तक संचालन के लिए तैयार किया जा रहा है। इसमें जड़त्वीय मापन इकाई लगाई गई है जो उड़ान के दौरान प्लेटफॉर्म की गति और स्थिति से जुड़े आंकड़े देती है।
इसमें ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम रिसीवर लगाया गया है। ऑनबोर्ड कैमरे भी लगाए गए हैं। ऊंचाई नियंत्रण तंत्र के साथ नियंत्रण इलेक्ट्रॉनिक पैकेज और अन्य उप प्रणालियां भी इसमें शामिल हैं। इन सभी प्रणालियों से उड़ान के दौरान प्लेटफॉर्म की स्थिति और प्रदर्शन से जुड़े आंकड़े जमीन तक पहुंचते रहे।
20 किमी ऊपर से सीधे जमीन तक पहुंचता रहा वीडियो
इस परीक्षण में तकनीक का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि एयरबोर्न प्लेटफॉर्म से वास्तविक समय का वीडियो और वाहन से जुड़े अन्य आंकड़े लगातार ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन पर प्राप्त होते रहे।
इसका मतलब यह है कि प्लेटफॉर्म के जमीन से बहुत अधिक ऊंचाई पर रहने के दौरान भी उसके प्रदर्शन पर नजर रखी जा सकती है। उड़ान के दौरान मिले आंकड़ों से निर्धारित प्रदर्शन की पुष्टि हुई और इन्हीं आंकड़ों का आगे विश्लेषण किया गया।
आगरा के लिए क्या बदला
एडीआरडीई के लिए यह परीक्षण केवल एक और उड़ान नहीं है। 2025 में करीब 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचने के बाद अब प्लेटफॉर्म 21 किलोमीटर तक पहुंचा है। 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर आधे घंटे से अधिक समय तक बने रहने की क्षमता ने परियोजना को अगले स्तर पर पहुंचाया है।
इससे आगरा में विकसित की जा रही तकनीक का दायरा भी बढ़ा है। अब एडीआरडीई के सामने केवल प्लेटफॉर्म को ऊंचाई तक पहुंचाने की चुनौती नहीं है बल्कि उसे समताप मंडल में नियंत्रित तरीके से लंबे समय तक संचालित करने की क्षमता विकसित करना भी परियोजना का हिस्सा है।
आगरा के लोगों को क्या फायदा होगा
इस परियोजना का सीधा फायदा अभी आम लोगों को किसी नई सुविधा के रूप में नहीं मिलेगा। इसका महत्व रक्षा और निगरानी क्षमता बढ़ने से जुड़ा है। एचएपीएस को लंबे समय तक ऊंचाई पर रहने वाली हवाई निगरानी प्रणाली के रूप में विकसित किया जा रहा है। ऐसे प्लेटफॉर्म भविष्य में बड़े क्षेत्र की निगरानी और लगातार हवाई निगरानी जैसे कामों में उपयोगी हो सकते हैं।
आगरा के लिए इसका सबसे बड़ा महत्व यह है कि शहर की एडीआरडीई देश की अत्याधुनिक एयरोस्पेस तकनीक के विकास में सीधे भूमिका निभा रही है। इस तरह की परियोजनाओं से आगरा की पहचान केवल ऐतिहासिक और पर्यटन नगरी के रूप में नहीं बल्कि रक्षा तकनीक के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी मजबूत होती है।
रोजगार और तकनीकी काम के अवसर बढ़ने की संभावना
एचएपीएस जैसी परियोजनाओं में केवल एक संस्थान के वैज्ञानिक ही काम नहीं करते। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, नियंत्रण प्रणाली, सेंसर, संचार, एयरोस्पेस और अन्य तकनीकी क्षेत्रों से जुड़ी विशेषज्ञता की जरूरत होती है।
परियोजना के आगे बढ़ने के साथ इन क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग और औद्योगिक भागीदारी बढ़ने की संभावना है। इससे आगरा में रक्षा तकनीक से जुड़े काम और विशेषज्ञता के लिए माहौल मजबूत हो सकता है। हालांकि मौजूदा परीक्षण से सीधे रोजगार की कोई संख्या जारी नहीं की गई है।
देश की निगरानी क्षमता के लिए महत्वपूर्ण
एचएपीएस को लंबे समय तक समताप मंडल में रहने वाले हवाई निगरानी प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया जा रहा है। करीब 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर काम करने वाली ऐसी प्रणालियां उपग्रहों और सामान्य विमानों के बीच एक अलग स्तर की निगरानी क्षमता उपलब्ध करा सकती हैं।
इस परियोजना की खासियत यह है कि यह स्वदेशी विकास पर आधारित है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी सफल परीक्षण को लंबे समय तक परिचालन में सक्षम समतापमंडलीय एयरशिप बनाने की दिशा में आत्मनिर्भर भारत की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है।
कई एजेंसियां परीक्षण में रहीं साथ
परीक्षण अकेले डीआरडीओ ने नहीं किया। भारतीय वायु सेना, सीईएमआईएलएसी, डीजीसीए, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और अन्य नागरिक प्राधिकरणों के समन्वय से उड़ान परीक्षण पूरा हुआ।
इस समन्वय के जरिए इतनी ऊंचाई पर उड़ान संचालन से जुड़े रक्षा और नागरिक विमानन के विभिन्न पहलुओं को साथ लेकर परीक्षण किया गया।
अब आगे का रास्ता
सफल परीक्षण के बाद उड़ान के दौरान मिले आंकड़ों का विश्लेषण किया जा रहा है। प्लेटफॉर्म को और विकसित करते हुए लंबे समय तक समताप मंडल में संचालन की क्षमता हासिल करना इसका अगला लक्ष्मण है।
आगरा की एडीआरडीई के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2025 की करीब 17 किलोमीटर की उड़ान से आगे बढ़ते हुए परियोजना अब 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच चुकी है। आने वाले चरणों में इसी तकनीक को और परिपक्व करके लंबे समय तक काम करने वाले स्वदेशी समतापमंडलीय एयरशिप के रूप में विकसित करने की दिशा में काम जारी रहेगा।
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16 हजार फीट से पैराट्रूपर ने लगाई छलांग, 15,500 फीट पर खुला पैराशूट और 13,700 फीट ऊंचे ड्रॉप जोन में सुरक्षित लैंडिंग
आगरा। ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में सैनिकों की सुरक्षित पैराशूट छलांग के लिए आगरा की एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट एडीआरडीई ने एडवांस्ड हाई एल्टीट्यूड पैराशूट तैयार किया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन डीआरडीओ ने पूर्वी लद्दाख के न्योमा मुध ड्रॉप जोन में इस स्वदेशी पैराशूट का पहला लाइव जंप परीक्षण सफलतापूर्वक किया। परीक्षण में पैराट्रूपर ने समुद्र तल से 16,000 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाई।
15,500 फीट पर पैराशूट खुला और करीब 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित न्योमा मुध ड्रॉप जोन में सुरक्षित लैंडिंग हुई। आगरा में डिजाइन और विकसित की गई इस तकनीक ने अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सैनिकों की सामूहिक युद्धक छलांग के लिए अपनी क्षमता साबित की है। इसकी परिचालन ऊंचाई सीमा 18,000 फीट तक है और उतरने की दर को सुरक्षित रखा गया है। इससे भारतीय रक्षा बलों को अधिक ऊंचाई वाले सामरिक क्षेत्रों में पैराट्रूपर्स की तैनाती के लिए स्वदेशी विकल्प मिलेगा।
आगरा में तैयार हुई ऊंचाई पर छलांग की तकनीक
एडवांस्ड हाई एल्टीट्यूड पैराशूट को आगरा स्थित एडीआरडीई ने डिजाइन और विकसित किया है। यह बड़ी संख्या में पैराट्रूपर्स को विमान से उतारने के लिए स्टैटिक लाइन पैराशूट सिस्टम है।

इस प्रणाली में पैराशूट विमान से जुड़ी स्थिर रस्सी यानी स्टैटिक लाइन के माध्यम से अपने आप तुरंत खुल जाता है। सामूहिक युद्धक छलांग में यह व्यवस्था पैराट्रूपर के लिए पैराशूट खोलने की प्रक्रिया को स्वचालित बनाती है।
16 हजार फीट से हुई पहली लाइव छलांग
पूर्वी लद्दाख के न्योमा मुध ड्रॉप जोन में हुए पहले लाइव जंप परीक्षण में पैराट्रूपर ने 16,000 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाई। पैराशूट 15,500 फीट की ऊंचाई पर खुला।
इसके बाद पैराट्रूपर ने करीब 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित न्योमा मुध ड्रॉप जोन में सुरक्षित लैंडिंग की। परीक्षण ने अधिक ऊंचाई वाले इलाके में पैराशूट के इस्तेमाल की क्षमता को परखा।
18 हजार फीट तक संचालन की क्षमता
एडवांस्ड हाई एल्टीट्यूड पैराशूट की परिचालन ऊंचाई सीमा 18,000 फीट तक रखी गई है। इसकी उतरने की दर भी सुरक्षित स्तर पर निर्धारित की गई है।
अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पैराशूट से छलांग लगाना सामान्य परिस्थितियों की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है। इतनी ऊंचाई पर पैराशूट खुलने के दौरान पैराट्रूपर को तेज झटका लग सकता है और उतरने की गति भी अधिक हो सकती है।
नई प्रणाली को इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य अधिक ऊंचाई पर पैराट्रूपर्स की सुरक्षित और प्रभावी तैनाती को आसान बनाना है।

पहाड़ी इलाकों में सेना के लिए उपयोगी
पूर्वी लद्दाख जैसे अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों की तैनाती कठिन परिस्थितियों में होती है। ऐसे क्षेत्रों में जरूरत पड़ने पर पैराट्रूपर्स को विमान से निर्धारित स्थान पर उतारने के लिए विशेष क्षमता वाले पैराशूट की जरूरत होती है।
एडवांस्ड हाई एल्टीट्यूड पैराशूट इसी आवश्यकता के लिए विकसित किया गया है। परीक्षण में न्योमा मुध जैसे अधिक ऊंचाई वाले ड्रॉप जोन पर सुरक्षित लैंडिंग ने इसकी सामरिक उपयोगिता को साबित किया है।
एक साथ बड़ी संख्या में सैनिकों को उतारने की व्यवस्था
यह पैराशूट सिस्टम बड़ी संख्या में पैराट्रूपर्स को विमान से उतारने के लिए तैयार किया गया है। स्टैटिक लाइन के माध्यम से पैराशूट स्वतः खुलने की व्यवस्था होने के कारण पैराट्रूपर को अलग से पैराशूट खोलने की प्रक्रिया नहीं करनी पड़ती।
इस तरह की प्रणाली का उपयोग मुख्य रूप से सैन्य अभियानों और सामूहिक युद्धक छलांगों के लिए किया जाता है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इसकी क्षमता सेना के लिए महत्वपूर्ण है।
आगरा की एडीआरडीई की तकनीकी भूमिका
इस पूरी परियोजना में आगरा की एडीआरडीई की भूमिका डिजाइन और विकास की रही है। संस्थान ने एडवांस्ड हाई एल्टीट्यूड पैराशूट को तैयार किया और इसकी तकनीकी क्षमता को परीक्षण के जरिए परखा गया। पैराशूट की निर्माण प्रक्रिया कानपुर की ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्ट्री ने पूरी की। इससे डिजाइन और विकास के साथ निर्माण की जिम्मेदारी अलग-अलग रक्षा संस्थानों के बीच जुड़ी रही।
गुणवत्ता जांच और प्रमाणन भी पूरा
पैराशूट प्रणाली का निरीक्षण रक्षा उत्पादन विभाग के गुणवत्ता आश्वासन महानिदेशालय ने किया। इसके बाद सैन्य विमानन योग्यता एवं प्रमाणन केंद्र और क्षेत्रीय सैन्य उड़नयोग्यता केंद्र कानपुर ने इसका प्रमाणन किया। इस प्रक्रिया के बाद प्रणाली को लाइव जंप परीक्षण के लिए इस्तेमाल किया गया। पूर्वी लद्दाख में सफल परीक्षण ने इसके संचालन से जुड़ी क्षमता को सामने रखा।
आगरा के लिए क्या बदला
इस उपलब्धि से आगरा की पहचान रक्षा अनुसंधान और एयरोस्पेस तकनीक के क्षेत्र में और मजबूत हुई है। एडीआरडीई पहले से पैराशूट और एयर डिलीवरी से जुड़ी तकनीकों के विकास में काम कर रही है। अब अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाली एडवांस्ड पैराशूट प्रणाली का सफल लाइव जंप परीक्षण इसकी तकनीकी क्षमता में एक और उपलब्धि है।
आगरा में तैयार तकनीक का परीक्षण देश के ऐसे क्षेत्र में हुआ है जहां ऊंचाई और भौगोलिक परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। इससे एडीआरडीई की विकसित प्रणाली का वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में परीक्षण भी हो गया है।
आगरा के लोगों को क्या फायदा
इस उपलब्धि का आम लोगों को सीधा लाभ किसी नागरिक सुविधा के रूप में नहीं मिलेगा। इसका लाभ रक्षा क्षमता और स्वदेशी तकनीक के स्तर पर है। आगरा में विकसित यह प्रणाली भारतीय रक्षा बलों को अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पैराट्रूपर्स की तैनाती के लिए देश में विकसित विकल्प उपलब्ध कराती है। इससे रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक और आगरा की वैज्ञानिक क्षमता को बढ़ावा मिलता है।
रक्षा तकनीक से जुड़े ऐसे प्रोजेक्ट आगे बढ़ने पर आगरा में वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी विशेषज्ञता और रक्षा क्षेत्र से जुड़े काम का आधार मजबूत होने की संभावना भी बढ़ती है। हालांकि इस परीक्षण के साथ रोजगार या स्थानीय स्तर पर निवेश की कोई अलग संख्या जारी नहीं की गई है।
राजनाथ सिंह ने दी बधाई
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्वदेशी पैराशूट प्रणाली एएचएपी के पहले लाइव जंप परीक्षण की सफलता पर डीआरडीओ, रक्षा बलों, रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों और उद्योग जगत को बधाई दी। उन्होंने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने परीक्षण से जुड़े सभी संस्थानों और टीमों की उपलब्धि की सराहना की।
डीआरडीओ अध्यक्ष ने भी दी शुभकामनाएं
रक्षा सचिव, रक्षा अनुसंधान एवं विकास सचिव और डीआरडीओ अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने भी इस प्रणाली के डिजाइन और विकास से जुड़े सदस्यों को बधाई दी।
एडवांस्ड हाई एल्टीट्यूड पैराशूट के सफल लाइव जंप परीक्षण के साथ आगरा की एडीआरडीई द्वारा विकसित प्रणाली ने अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पैराट्रूपर्स की सुरक्षित तैनाती की दिशा में अपनी क्षमता साबित की है। अब यह तकनीक भारतीय रक्षा बलों की ऊंचाई वाले सामरिक क्षेत्रों की जरूरतों के लिए एक स्वदेशी विकल्प के रूप में सामने आई है।

