आगरा। फतेहाबाद रोड स्थित जेपी वेडिंग ग्राउंड में करुणानिधान परिवार की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के तीसरे दिन रामनाम, कृष्णभक्ति और संतवाणी का ऐसा रस बरसा कि हजारों श्रद्धालु भक्ति में डूब गए। मोरारी बापू ने ‘मानस ऋषि पंचमी’ के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए ऋषि और मुनि के अंतर को समझाया। उन्होंने कहा कि ऋषि बाहर के ब्रह्मांड की खोज करता है, जबकि मुनि भीतर के ब्रह्मांड में उतरता है। कथा के दौरान मीराबाई के पदों और रामधुन से वातावरण भावविभोर हो गया। कई श्रद्धालुओं की आंखों से भक्ति के आंसू छलक पड़े। बापू ने सप्ताह में कम से कम एक दिन मौन रखने की सलाह दी और कहा कि यदि यह संभव न हो तो जन्मदिन पर अपनी आयु के बराबर घंटे मौन धारण करें। युवाओं में तनाव से जुड़े सवाल पर उन्होंने सुबह और शाम कुछ समय एकांत में बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करने की बात कही। उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवन का सरल सूत्र देते हुए कहा, “भोजन कम करें और भजन ज्यादा करें।”

बापू ने मानस से ‘ऋषि’ शब्द उठाते हुए सभी मुनियों को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में जितने भी बड़े वैज्ञानिक हुए, उन्होंने बाहरी जगत और ब्रह्मांड को जानने का प्रयास किया। आइंस्टीन, न्यूटन अथवा अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले नील आर्मस्ट्रांग ने बाहरी दुनिया के रहस्यों को समझने की कोशिश की। भारतीय मनीषा ने ऐसे अन्वेषकों को ऋषि-भाव से देखा है। परमाणु से लेकर अंतरिक्ष तक की खोज करने वाला बाहरी ब्रह्मांड को जानता है, जबकि मुनि अपने भीतर उतरकर अंतर्जगत की खोज करता है। बापू ने रामकथा के परम गायक काकभुशुंडि का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी यात्रा बाहरी और भीतरी दोनों रही। एक ओर उन्होंने ब्रह्मांड को देखा तो दूसरी ओर अपने भीतर के ब्रह्मांड को जाना। विश्वामित्र जब स्वर्ग की रचना करते हैं तो उनका ऋषि स्वरूप सामने आता है और जब भीतर के दर्शन को जागृत करते हैं तो मुनि भाव प्रकट होता है।

श्रद्धालुओं की प्रश्न-पत्रियों का उत्तर देते हुए बापू ने कबीर, गुरु नानक, रामकृष्ण, मीराबाई, नरसी मेहता और तुकाराम जैसे संतों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इनमें ऋषि और मुनि दोनों के गुण दिखाई देते हैं, इसलिए ये संयुक्त रूप से साधु-स्वरूप हैं। गुरु का चित्र घर में रखने के सवाल पर उन्होंने कहा कि गुरु का चित्र आंखों के सामने रहकर प्रेरणा देता है। महाभारत के एकलव्य का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उसने गुरु की मूर्ति के सामने साधना की और अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। गुरु का चित्र केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि उनके चरित्र को धारण करने की प्रेरणा के लिए होना चाहिए।
बापू ने श्रीराम के जीवन की विभिन्न लीलाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि अयोध्या से लेकर पंचवटी, वनवास, किष्किंधा, रावण युद्ध और रामराज्याभिषेक तक भगवान राम ने अपने जीवन से धर्म और मर्यादा का चित्रण किया। इसी तरह श्रीकृष्ण की लीलाएं ब्रज में प्रेम, भक्ति और समर्पण का संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा शिष्य अपने गुरु का बहुत अधिक बखान नहीं करता। सच्चे शिष्य के आचरण से ही गुरु की खुशबू फैलती है।
ऋषि और मुनि के अंतर को आगे समझाते हुए बापू ने कहा कि ऋषियों के पास सिद्धियां होती हैं और मुनियों के पास शुद्धि। ऋषि कर्मयोगी होते हैं और समाज के लिए निर्माण करते हैं। उन्होंने कपटपूर्ण साधु-संग से बचने की बात कही। जिसके पास भजन की संपदा नहीं है, वह मुनि नहीं हो सकता। मुनि का मौन भी सार्थक होता है और उसका वचन भी। इसलिए किसी का संग सोच-समझकर करना चाहिए। जगद्गुरु वल्लभाचार्य के सूत्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि घर के लोग एक-दूसरे के सहायक बनें तो वही सत्संग है। यदि वे स्वयं सत्संग न करें, लेकिन आपको रोकें भी नहीं तो उनके प्रति धन्यवाद का भाव होना चाहिए।
युवाओं में बढ़ते तनाव के सवाल पर बापू ने कहा कि सुबह और शाम कुछ समय एकांत में बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। हनुमान जी का ध्यान चंचल मन को शांत करता है। व्यासपीठ के पीछे हनुमान जी का चित्र रखने के कारण पर उन्होंने कहा कि व्यासपीठ की जो भी प्रतिष्ठा है, वह हनुमान जी की है। उन्होंने हनुमान जी को गृहस्थ, ब्रह्मचारी, संन्यासी और वानप्रस्थ, हर अवस्था के लिए आदर्श बताया।
रामकथा के बीच श्रीकृष्ण की धुन और मीराबाई के पदों की गूंज उठी। बापू ने मीरा की कृष्णभक्ति का गुणगान किया तो कथा पंडाल में श्रद्धा का भाव उमड़ पड़ा। उन्होंने कहा कि जो मानस की उपासना करेगा, मानस सदैव उसके समक्ष खड़ा रहेगा। रात को सोने से पहले मानस की कुछ चौपाइयों का पाठ करने और शुभ विचारों के साथ सोने की बात भी कही।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उल्लेख करते हुए बापू ने कहा कि तकनीक मनुष्य के लिए उपयोगी है, लेकिन यदि तकनीक मन और मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाने लगे तो यह चिंता का विषय है। उन्होंने कहा, “मशीन मशीन होती है, लेकिन व्यासपीठ एक मिशन है।” व्यासपीठ के मिशन को उन्होंने सच्चे मनुष्य बनाने से जोड़ा। श्रद्धालुओं से उन्होंने कहा कि जीवन में दुखी मिलने वाले व्यक्ति को गले लगाकर चलें और प्रेम की गंगा बहाते रहें। कथा के दौरान उमाशंकर व्यास, प्रेमनिधि मंदिर के मुख्य सेवायत हरिमोहन गोस्वामी सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल ने आरती उतारी।
