हापुड़। उत्तर प्रदेश के हापुड़ जनपद अंतर्गत हवीशपुर बिगास गांव में शिकारी द्वारा लगाए गए घातक लोहे के जाल में फंसी एक मादा तेंदुए को उत्तर प्रदेश वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस के संयुक्त रेस्क्यू अभियान में सुरक्षित बचा लिया गया।
यह तेंदुआ सरसों के खेत में छिपे लोहे के जाल में बुरी तरह फंसी हुई थी, जिसका अगला बायां पैर जाल में कसकर फंसा हुआ था। दर्द और भय से कराह रही मादा तेंदुए की हालत गंभीर बनी हुई थी।
खेत में काम कर रहे स्थानीय किसानों ने सबसे पहले खेत के बीच घायल तेंदुए को देखा। तेंदुए की स्थिति को भांपते हुए किसानों ने बिना समय गंवाए वन विभाग को सूचना दी। मामला सामने आते ही वाइल्डलाइफ एसओएस की रैपिड रिस्पांस यूनिट को उनकी आपातकालीन हेल्पलाइन के माध्यम से अलर्ट किया गया। सूचना मिलते ही वन विभाग के अधिकारियों के साथ वाइल्डलाइफ एसओएस के आठ सदस्यीय अनुभवी बचाव दल और एक पशु चिकित्सक तत्काल मौके पर पहुंचे।
चार घंटे तक चले इस चुनौतीपूर्ण बचाव अभियान में तेंदुए और मानव सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए हर कदम बेहद सावधानी से उठाया गया। बचाव दल ने पहले क्षेत्र को सुरक्षित किया, ग्रामीणों को दूर रखा और स्थिति को नियंत्रित किया।
इसके बाद लोहे के घातक जाल को विशेष उपकरणों की मदद से काटकर मादा तेंदुए को मुक्त किया गया। जाल से बाहर निकालते ही तेंदुए को सुरक्षित पिंजरे में रखा गया ताकि उसे और अधिक तनाव या चोट न पहुंचे।
मौके पर ही तेंदुए की प्राथमिक चिकित्सीय जांच की गई और आवश्यक दवाएं दी गईं। इसके बाद उसे लगभग एक दिन तक निगरानी में रखकर उपचार किया गया। इस दौरान उसकी भूख, गतिविधियों और चोटों पर लगातार नजर रखी गई।
पूरी तरह स्वस्थ घोषित होने के बाद मादा तेंदुए को उत्तर प्रदेश के शिवालिक क्षेत्र स्थित बड़कलां वन क्षेत्र में सुरक्षित रूप से उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया।
मेरठ ज़ोन के वन संरक्षक आदर्श कुमार, आईएफएस ने बताया कि शिकारी अक्सर जंगली जानवरों को पकड़ने के लिए खेतों के भीतर और आसपास इस तरह के अवैध जाल गुप्त रूप से बिछा देते हैं। ये जाल न केवल वन्यजीवों बल्कि आम किसानों और ग्रामीणों के लिए भी गंभीर खतरा बनते हैं।
किसानों की त्वरित सूचना और वन विभाग तथा वाइल्डलाइफ एसओएस की संयुक्त कार्रवाई से इस मादा तेंदुए को बिना किसी स्थायी नुकसान के सुरक्षित बचा लिया गया। वन विभाग मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को रोकने और समाधान के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी कार्तिक सत्यनारायण ने कहा कि ऐसे बचाव अभियान समय पर सूचना मिलने से ही सफल हो पाते हैं। लोहे के जाल में फंसे रहने से तेंदुए को असहनीय पीड़ा हुई होगी, लेकिन टीम की तत्परता से उसे बचा लिया गया और अब वह फिर से जंगल में स्वतंत्र जीवन जी सकेगी।
वाइल्डलाइफ एसओएस के कंजर्वेशन प्रोजेक्ट्स निदेशक बैजूराज एम.वी. ने बताया कि शिकारी द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोहे के जाल पूरे देश में वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। ये जाल वजन पड़ते ही अत्यधिक बल से बंद हो जाते हैं और गंभीर चोट या मौत का कारण बन सकते हैं।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत इस तरह के जालों का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित है। इस सफल रेस्क्यू से वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस की पेशेवर दक्षता और समन्वय स्पष्ट रूप से सामने आया है।
वाइल्डलाइफ एसओएस के वन्यजीव पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राहुल प्रसाद ने बताया कि मादा तेंदुए के अगले बाएं पैर में हल्की चोटें पाई गई थीं।
उसे दर्द निवारक दवाओं के साथ आवश्यक उपचार दिया गया और पूरी तरह स्वस्थ होने तक निगरानी में रखा गया। स्वास्थ्य में सुधार के बाद उसे मानव बस्तियों से दूर सुरक्षित वन क्षेत्र में छोड़ा गया।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार तेंदुए स्वभाव से बेहद शर्मीले होते हैं और सामान्य परिस्थितियों में मनुष्यों से दूरी बनाए रखते हैं। हालांकि प्राकृतिक आवासों में बढ़ते अतिक्रमण और जंगलों के सिमटने के कारण तेंदुए भोजन और ठिकाने की तलाश में मानव बस्तियों के पास पहुंचने को मजबूर हो रहे हैं।
भारतीय तेंदुआ (पैंथेरा पार्डस फुस्का) वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अनुसूची-एक की संरक्षित प्रजाति है और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की रेड डेटा सूची में इसे ‘वल्नरेबल’ श्रेणी में रखा गया है।
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