आगरा। हर सुबह कोई घर से निकलता है और शाम तक लौट नहीं पाता। कहीं पिता की कुर्सी खाली रह जाती है, कहीं मां की गोद सूनी हो जाती है। सड़क पर होने वाले ये हादसे अब सिर्फ खबर नहीं, हर परिवार के लिए डर बन चुके हैं। ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2024 में सड़क सुरक्षा के बुनियादी नियमों की अनदेखी हेलमेट, सीट बेल्ट और स्पीड उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मौतों की वजह बनी। देश में सड़क हादसों से जान गंवाने वालों में हर सातवां व्यक्ति उत्तर प्रदेश का रहा, जो हालात की गंभीरता को खुद बयान करता है।
भारत में सड़कें विकास और रफ्तार की पहचान बन चुकी हैं, लेकिन इसी रफ्तार ने 2024 में 1,77,177 जिंदगियां भी छीन लीं। इनमें से अकेले उत्तर प्रदेश में 24,118 लोगों की मौत हुई, जो देश की कुल सड़क दुर्घटना मौतों का 13.61 प्रतिशत है। यानी देश में सड़क हादसे से मरने वाले लगभग हर सात में से एक व्यक्ति उत्तर प्रदेश का है।
पूरे देश में 2024 के दौरान 4,87,705 सड़क हादसे हुए, जिनमें से 46,052 हादसे उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन हजारों परिवारों की टूटी दुनिया है, जिनकी जिंदगी एक पल में बदल गई।
2020 से 2024 के बीच प्रदेश में सड़क हादसों की संख्या लगातार बढ़ी है। जहां 2020 में 34,243 दुर्घटनाएं हुई थीं, वहीं 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 46,052 हो गया। इसी अवधि में मौतों की संख्या 19,149 से बढ़कर 24,118 तक पहुंच गई। यह साफ संकेत है कि सड़क सुरक्षा के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश लगातार पिछड़ रहा है।
चिंताजनक बात यह है कि जिन कारणों से होने वाली मौतों को रोका जा सकता था, उन्हीं में उत्तर प्रदेश देश में शीर्ष पर रहा। कुल सड़क हादसों में मृत्यु के मामले में प्रदेश देश में पहले स्थान पर है। ओवरलोडिंग से होने वाली दुर्घटनाओं और मौतों में भी उत्तर प्रदेश अव्वल है। सीट बेल्ट न पहनने से होने वाली मौतों में प्रदेश देश में पहले स्थान पर रहा। ओवरस्पीडिंग से होने वाली मौतों में उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है, जबकि बिना ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने से होने वाली दुर्घटनाओं में भी प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा। हेलमेट न पहनने से होने वाली मौतों में उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर है, लेकिन संख्या फिर भी बेहद अधिक है।
वर्ष 2024 में ओवरस्पीडिंग के कारण प्रदेश में 12,010 लोगों की मौत हुई, जबकि 2023 में यह संख्या 8,726 थी। बढ़ते एक्सप्रेसवे नेटवर्क और तेज रफ्तार वाहनों ने इन मौतों में बड़ा योगदान दिया है। यदि एक्सप्रेसवे पर गति नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा और भयावह हो सकता है।
ओवरलोडिंग भी प्रदेश में मौतों की बड़ी वजह बनी। 2024 में ओवरलोडिंग के कारण 3,294 लोगों की जान गई और 6,340 सड़क हादसे हुए। इस मामले में उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर रहा। तुलना करें तो दूसरे स्थान पर मध्य प्रदेश रहा, जहां 1,495 मौतें हुईं जो उत्तर प्रदेश के मुकाबले लगभग 45 प्रतिशत ही हैं।
सीट बेल्ट न पहनने को अक्सर मामूली लापरवाही समझा जाता है, लेकिन 2024 में इसी कारण देश में सबसे अधिक मौतें उत्तर प्रदेश में हुईं। वर्ष 2024 में सीट बेल्ट न पहनने से प्रदेश में 2,816 मौतें हुईं। हालांकि राहत की बात यह है कि 2023 में यह संख्या 3,476 थी, लेकिन आंकड़ा अब भी बेहद चिंताजनक है।
बिना ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने की प्रवृत्ति भी जानलेवा साबित हो रही है। देशभर में 2024 में बिना लाइसेंस चालकों के कारण 32,603 सड़क हादसे हुए, जिनमें से 5,122 हादसे उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। इस सूची में प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा।
देशभर में सड़क हादसों में मौतों का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। 2020 में 1,38,383 मौतें हुई थीं, जो 2024 में बढ़कर 1,77,177 हो गईं। 2024 में जहां सड़क हादसों की संख्या में 1.48 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं मौतों में 2.47 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दोपहिया वाहन चालकों और सवारियों द्वारा हेलमेट न पहनने के कारण ही 2024 में 54,493 लोगों की जान चली गई।
वरिष्ठ अधिवक्ता और रोड सेफ्टी एक्टिविस्ट के.सी. जैन का कहना है कि प्रदेश में एक्सप्रेसवे का बढ़ता नेटवर्क विकास के नए द्वार खोल रहा है, लेकिन सड़क सुरक्षा को लेकर सख्त कदम उठाना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने यातायात नियमों के कड़ाई से पालन और चालान व्यवस्था को सख्त करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। इस मामले में न्यायालय ने परिवहन और न्याय सचिव को 22 नवंबर को शपथ पत्र दाखिल करने के आदेश दिए थे, जबकि अगली सुनवाई 22 जनवरी को तय है।
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| केसी जैन, वरिष्ठ अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट |
के.सी. जैन के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सड़क सुरक्षा की स्थिति अत्यंत गंभीर है। अत्यधिक गति, हेलमेट और सीट बेल्ट का पालन न करना तथा बिना लाइसेंस वाहन चलाना इन सभी कारणों से होने वाली मौतों में प्रदेश देश में सबसे ऊपर है। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि हर दिन टूटते परिवारों की कहानी है। सरकार और जनता दोनों को मिलकर सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।
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