• Mon. Mar 2nd, 2026

Today News Track

India #1 News Platform

UP News:क्या नशे में ड्राइविंग भी माफ? यूपी में 12 लाख ट्रैफिक केस खत्म, सुप्रीम कोर्ट का कड़ा सवाल

Spread the love

आगरा। उत्तर प्रदेश में 2017 से 2021 तक के 12 लाख से अधिक ट्रैफिक केस खत्म करने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि अशमनीय अपराध भी यदि एक झटके में समाप्त कर दिए जाएंगे तो सड़क सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा होगा।

 कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसे कानून से नशे में ड्राइविंग, लालबत्ती तोड़ने और खतरनाक ओवरटेक जैसे गंभीर अपराधों के प्रति कानून का डर खत्म हो जाएगा और आरोपी बिना दंड के बच निकलेंगे। अदालत ने यूपी सरकार से धारा-वार औचित्य बताने के लिए शपथ पत्र मांगा है।

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2023 में लागू किए गए उस संशोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है, जिसके तहत 1 जनवरी 2017 से 31 दिसंबर 2021 तक के सभी लंबित ट्रैफिक मामले समाप्त कर दिए गए थे। अदालत ने कहा कि इस संशोधन ने अशमनीय अपराधों तक को एक झटके में खत्म कर दिया है, जिससे सड़क सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा होगा और कानून के प्रति भय समाप्त हो जाएगा।

अधिवक्ता एवं रोड सेफ्टी एक्टिविस्ट के.सी. जैन द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को सुनवाई की। सुनवाई जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने की। अदालत ने यूपी सरकार के परिवहन और विधि विभाग को निर्देश दिया कि वे धारा-वार यह स्पष्ट करें कि किन कारणों से इतने बड़े पैमाने पर ट्रैफिक मामलों को समाप्त किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा
“यदि ट्रैफिक अपराध अशमनीय है, तो हम आश्चर्य करते हैं कि राज्य किस प्रकार एक संशोधन लाकर एक ही झटके में अदालत को बता सकता है कि इनके सम्बन्ध में लंबित कार्यवाही समाप्त हो गई है। इसका परिणाम यह होगा कि नशे में वाहन चलाने के आरोप में बुक किया गया व्यक्ति बिना किसी दंड के बच निकल जाएगा—भले ही मामला 5 वर्षों से लंबित हो। परंतु क्या केवल लंबी अवधि बीत जाना कार्यवाही समाप्त करने का औचित्य बन सकता है? इस प्रकार एकमुश्त कार्यवाही की समाप्ति से ऐसे अपराधों के प्रति डर पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।”

कोर्ट ने कहा कि धारा 185 (नशे में ड्राइविंग) तो केवल एक उदाहरण है। ऐसे कई अपराध हैं जो इस संशोधन अधिनियम के कारण समाप्त कर दिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की
“भारत जैसे देश में यातायात एक बड़ी समस्या है। बड़े शहरों सहित कस्बों में भी ट्रैफिक का नियमन अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। नागरिक भी ट्रैफिक नियमों के पालन में अनुशासित नहीं हैं। ऐसी परिस्थिति में आवश्यक है कि डर बना रहे—विशेष रूप से युवाओं के लिए—ताकि लोग मोटर वाहन अधिनियम से संबंधित अपराधों में लिप्त न हों। यह अत्यधिक शक्तिशाली कारों का युग है और आम अनुभव है कि चालक इन कारों को नियंत्रित नहीं कर पाते जिससे दुर्घटनाएँ होती हैं।

कोर्ट ने कहा कि प्रस्तुत तथ्यों से यह स्पष्ट है कि लंबित मामलों की समाप्ति का प्रभाव गंभीर होगा, क्योंकि मोटर वाहन अधिनियम के सभी दंडनीय अपराधों से जुड़ी आपराधिक कार्यवाहियाँ स्वतः समाप्त हो गई हैं।

कोर्ट ने 13 ऐसे अपराध गिनाए जो अशमनीय हैं और फिर भी समाप्त कर दिए गए। इनमें शामिल हैं

  1. धारा 184(a) – लाल बत्ती कूदना
  2. धारा 184(b) – स्टॉप साइन का उल्लंघन
  3. धारा 184(d) – अवैध ओवरटेक
  4. धारा 182A(2) – लाइसेंस से संबंधित अपराध
  5. धारा 185 – नशे में वाहन चलाना
  6. धारा 187 – दुर्घटना से संबंधित अपराध
  7. धारा 188 – कुछ अपराधों के उकसावे का दंड
  8. धारा 190(1)(3) – असुरक्षित वाहन का उपयोग
  9. धारा 192B(1)(2) – पंजीकरण संबंधी अपराध
  10. धारा 193 – बिना प्राधिकरण एजेंट/एग्रीगेटर काम
  11. धारा 197 – बिना अधिकार वाहन ले जाना
  12. धारा 198A – सड़क निर्माण मानकों का उल्लंघन
  13. धारा 199A – किशोर द्वारा किए गए अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतने गंभीर अपराधों का समाप्त कर दिया जाना सड़क सुरक्षा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा।

“हम यूपी के विधि एवं परिवहन विभाग के सचिवों को निर्देश देते हैं कि वे बताएं कि आखिर किन आधारों पर इतनी बड़ी संख्या में ट्रैफिक मामलों को समाप्त किया गया। यदि हमारी भाषा कठोर न प्रतीत हो, तो भी हम यह कहना चाहते हैं कि यह संशोधन लंबित मामलों का बोझ कम करने का साधन नहीं होना चाहिए।”

44 साल में 5 बार ऐसे कानून बने

याचिकाकर्ता अधिवक्ता जैन ने बताया कि वर्ष 1977 से वर्ष 2021 तक, यानी 44 वर्ष में 5 बार, यूपी में ऐसे कानून बनाए गए जिनसे लंबित ट्रैफिक मुकदमे समाप्त कर दिए गए।उन्होंने कहा कि इसी कारण ट्रैफिक नियमों के प्रति भय लगातार कम होता गया और 2019 से 2023 तक पूरे देश में सड़क हादसों में सबसे अधिक मौतें उत्तर प्रदेश में हुईं।

इस कानून के कारण 10,46,163 ट्रैफिक मुकदमे प्रदेश की अदालतों में समाप्त हुए और 1 लाख से अधिक चालान परिवहन विभाग ने खत्म कर दिए।

केसी जैन, याचिकाकर्ता एवं अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट स्रोत: स्वयं

यह केवल कानून का प्रश्न नहीं है—यह मानव जीवन का प्रश्न है। हर वर्ष उत्तर प्रदेश में हजारों लोग सड़क हादसों में जान गंवाते हैं। ट्रैफिक अपराधों को एक झटके में खत्म करने वाले ऐसे कानून उन परिवारों के प्रति अन्याय हैं जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है। यदि नशे में ड्राइविंग, लाल बत्ती तोड़ने या खतरनाक ओवरटेकिंग जैसे गंभीर अपराध भी वर्षों बाद ‘स्वतः समाप्त’ कर दिए जाएंगे, तो हम अपने बच्चों और नागरिकों को कैसी सड़कें सौंप रहे हैं? मैं यह याचिका नागरिक के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि सड़कें सुरक्षित रहें और कानून का भय बना रहे।

केसी जैन, अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट एवं याचिकाकर्ता

#SupremeCourt #UttarPradesh #DrunkDriving #RoadSafety #TrafficLaw #MotorVehiclesAct #IndiaNews #LegalUpdates #TrafficRules #PublicSafety

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *